भगवान के घर में पुरातन का आतंक
अमेरिकी लोकतंत्र की मजबूती देखनी हो तो उनके सिनेमा में देखनी चाहिए। वहां किसी धर्म का सूत्र पकड़कर कोई काल्पनिक कथा गढ़ने में बवाल नहीं होता। अपने यहां भी अब जाकर ‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ और ‘महाराज’ जैसी फिल्में बननी शुरू हुई हैं लेकिन इनको दर्शकों तक पहुंचाने में जो मशक्कत करनी होती है, उसमें इनकी सीक्वल बन पाना अब भी दूर की कौड़ी ही है। फिल्म ‘इम्मैकुलेट’ एक ऐसे पादरी की कहानी है जो शायद जीव विज्ञानी भी है। उसे इस बात का भ्रम है कि वह ईश्वर के पुत्र का नया अवतार पैदा कर सकता है। कहानी शुरू होती है सिसिलिया के अपना घरबार सब कुछ यौवनावस्था में ही छोड़ नन बनकर एक ऐसी जगह आकर रहना शुरू करने से, जहां सिर्फ स्त्रियां हैं। अलग-अलग आयु वर्ग की। बच्चियां, जवान, बूढ़ी। किसी किसी के तलवे पर क्रॉस से दागे जाने के निशान भी हैं। सिसिलिया किसी दूसरी दुनिया की ही कल्पना में है। उसे ये ईश्वर से मिलने का, मुक्ति का मार्ग दिखाई देता है लेकिन जो यहां मार्गदर्शक है वही सबसे बड़ा भक्षक है।
एंड्र्यू लॉबेल की लुभाने वाली हॉरर कथा
फिल्म ‘इम्मैकुलैट’ की कहानी काफी परतदार है। एंड्र्यू लॉबेल ने इस डरावनी कहानी में धर्म के छींटे मारकर इसे नई पीढ़ी के साइंस फिक्शन जैसा जामा पहनाने की कोशिश की है। डरावनी फिल्में सिर्फ डर की बूटी से अब ताकत नहीं पा रही हैं। इनमें कभी हास्य का तड़का लगाया जा रहा है, कभी मर्डर मिस्ट्री का तो अब साइंस भी हॉरर का हिस्सा बन रहा है। फिल्म की पटकथा जोरदार है। कहानी में भी दर्शकों को डराने वाले तत्व हैं। जम्पस्केयर भले यहां रूटीन हॉरर फिल्म जैसे न हों लेकिन शुरू में बिल्कुल टिंच व साफ सुथरी दिखने वाली नन को हालात से रगड़ते हुए खून से सराबोर करने के दृश्यों तक लाने में ये फिल्म लंबा सफर तय करती है। फिल्म एक ही चर्चनुमा हवेली में शूट की गई है और धरती के ऊपर, नीचे चलती ये कहानी उत्सुकता जगाती चलती है।
माइकल मोहन की मेहनत सफल
माइकल मोहन का हॉलीवुड सिनेमा में अपना एक अलग खांचा रहा है। वह साधारण कहानियों को बेहतरीन इरॉटिका बनाने में महारत रखते हैं। कहानी प्रेम की हो, हास्य की हो या फिर डर की, उन्हें अपनी नायिकाओं को दर्शकों के सामने इस तरह से पेश करने की कला आती है कि हीरोइन कुछ भी न पहने फिर भी वह अश्लील नहीं लगती है। ऐसे एक दो प्रयोग उन्होंने इस फिल्म में भी किए हैं। कला खासतौर से चित्रकला में निर्वसना स्त्रियों व पुरुषों को कलात्मक रूप से पेश करने में इटली से लेकर भारत तक अतीत के कलाकारों को अद्भुत संतुलन हासिल रहा है। माइकल मोहन इन पुरातन स्मृतियों को अपनी फिल्मों का लगातार हिस्सा बनाते रहे हैं, यहां अपनी फेवरिट हीरोइन सिडनी स्वीनी को भी वह इस रास्ते पर करीब-करीब ले ही आते हैं।
‘इम्मैकुलेट’ की असल प्राणवाहक
सिडनी स्वीनी जैसी अभिनेत्रियां ही इस तरह के नए सिनेमा की प्राणवाहक हैं। उनके पास ही फिल्म ‘इम्मैकुलेट’ की कहानी सबसे पहले आई थी और उन्होंने ही माइकल मोहन को इस फिल्म से बतौर निर्देशक जोड़ा। वह फिल्म की निर्माताओं में भी शामिल हैं। फिल्म की पूरी कहानी का केंद्र बिंदु वह ही है और उन्हें निर्देशक ने एक सुंदर षोडशी से लेकर एक वीभत्स मां के रूप में परदे पर पेश करने में सफलता पाई है। फिल्म को एलिशा क्रिश्चियन की सिनेमैटोग्राफी सेखाद मदद मिलती है। विल बेट्स का संगीत माहौल बनाने में सफल है।