कैसा है अभिनय?
यह इस सीरीज का सबसे मजबूत पक्ष है। अनीत पड्डा का अभिनय सीरीज की सबसे बड़ी ताकत है। ‘सैयारा’ के बाद यहां एक बार फिर वह ऐसे किरदार में हैं, जिसमें भावनात्मक उतार-चढ़ाव काफी हैं। मीनू सिर्फ डरी हुई लड़की नहीं है। वह कई जगह गुस्से में है, कहीं असमंजस में है और कहीं अपने लिए लड़ने का साहस भी दिखाती है। अनीत इन भावनाओं को जरूरत से ज्यादा नाटकीय बनाए बिना पर्दे पर उतारती हैं। खासकर कोर्टरूम वाले हिस्सों में उनका अभिनय कहानी को भावनात्मक वजन देता है।
फातिमा सना शेख भी जसलीन के किरदार में संयमित नजर आती हैं। उन्होंने पुलिस अधिकारी को किसी सुपरवुमन की तरह पेश करने के बजाय एक ऐसी अधिकारी के रूप में निभाया है जो धीरे-धीरे केस की गंभीरता और उससे जुड़े दबावों को समझती है।
फातिमा और अनीत के बीच के दृश्य सीरीज के सबसे मजबूत हिस्सों में शामिल हैं। दोनों किरदारों के बीच का भरोसा कहानी को भावनात्मक आधार देता है।
वहीं रघुबीर यादव को ‘पंचायत’ में इतना मासूम किरदार करते देखने के बाद यहां बापजी के रूप में देखना बेहद दिलचस्प है। वह इस किरदार को चीखने-चिल्लाने वाला पारंपरिक खलनायक नहीं बनाते बल्कि, उनका शांत व्यवहार ही किरदार को असहज बनाता है। कभी बेहद स्नेही नजर आने वाला उनका किरदार अगले ही पल डर पैदा करता है। हालांकि समस्या यह है कि इतना प्रभावशाली किरदार होने के बावजूद पटकथा उसके व्यक्तित्व और उसके प्रभाव की जड़ों में ज्यादा गहराई से नहीं जाती।
मोहम्मद जीशान अय्यूब वकील की भूमिका में कोर्टरूम वाले हिस्सों को मजबूती देते हैं। राम कपूर के साथ उनके दृश्य अच्छे हैं। अर्जुन माथुर का पत्रकार वाला ट्रैक कहानी में मीडिया की भूमिका जोड़ता है, लेकिन यह हिस्सा उतनी मजबूती से विकसित नहीं हो पाता। इसी तरह कई सहायक किरदारों को कहानी में जगह तो मिलती है, लेकिन उन्हें पर्याप्त विस्तार नहीं दिया गया।