'होमबाउंड' फिल्म रिव्यू
- फोटो : सोशल मीडिया
कहानी
कहानी दो दोस्तों की है - मोहम्मद शोएब (ईशान खट्टर) और चंदन कुमार (विशाल जेठवा)। दोनों का सपना है पुलिस की वर्दी पहनना। लेकिन समाज की पुरानी दीवारें बार-बार उनके रास्ते में आ खड़ी होती हैं - शोएब को उसकी धार्मिक पहचान रोकती है और चंदन को उसकी जाति। यह संघर्ष हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या मेहनत और लगन सचमुच काफी हैं, या हमारे सपनों से भी बड़ी समाज की ये पुरानी जंजीरें हैं। कहानी में सुधा भारती (जान्हवी कपूर) का किरदार रोशनी की तरह आता है। वह हालात से लड़ते हुए भी बड़े सपने देखती है और उम्मीद का प्रतीक बनती है।
'होमबाउंड' फिल्म रिव्यू
- फोटो : सोशल मीडिया
अभिनय
अभिनय 'होमबाउंड' की सबसे बड़ी ताकत है। ईशान खट्टर ने मोहम्मद शोएब के किरदार में जान डाल दी है। उनकी आंखों में कभी सपनों की चमक दिखती है, तो कभी टूटी उम्मीदों का दर्द। उनके चेहरे की खामोशी कई बार उन शब्दों से ज्यादा बोलती है, जो जुबान पर नहीं आते। विशाल जेठवा चंदन के रूप में पूरी फिल्म का दिल हैं। उनकी सादगी, उनकी चुप्पी और भीतर की आग इतनी सच्ची लगती है कि हर सीन आपको झकझोर देता है। उनकी अदाकारी हमें बार-बार 'मसान' के दीपक (विक्की कौशल) की याद दिलाती है... वही दर्द और वही सपनों की जिद।
जान्हवी कपूर सुधा भारती के किरदार में कम लेकिन असरदार मौजूदगी दर्ज कराती हैं। उनकी सादगी कहानी में एक ताजगी भर देती है। बस अफसोस यही है कि उनके किरदार को और गहराई दी जाती तो वह और भी यादगार बन सकती थीं। वहीं सपोर्टिंग कास्ट ने भी पूरी फिल्म को असली रंग दिया है.. हर छोटा किरदार कहानी को और रियल बना देता है।
निर्देशन
निर्देशन की बात करें तो नीरज घेवान फिर साबित करते हैं कि वह आम इंसानों की कहानियों को असली जमीन पर उतारना जानते हैं। 'मसान' में जहां गंगा घाट और जलती चिताओं के बीच की जिंदगी दिखाई थी, वहीं 'होमबाउंड' में लॉकडाउन, जहां की गलियां और छोटे घरों की तंग खामोशियां दिखती हैं। हर सीन बिल्कुल हकीकत जैसा लगता है। कैमरे की नजर इतनी सच्ची है कि आप खुद को वहीं खड़ा महसूस करते हैं।
'होमबाउंड' फिल्म रिव्यू
- फोटो : सोशल मीडिया
संगीत
फिल्म का संगीत सादा, लेकिन असरदार है। गाने अमित त्रिवेदी ने बनाए हैं और बैकग्राउंड म्यूजिक नारायण चंद्रवर्खर और बेनेडिक्ट टेलर का है। गाने कम हैं... पर जहां आते हैं वहां कहानी में गहराई और भावनाओं को और मजबूत कर देते हैं। बैकग्राउंड म्यूजिक भी दिल को छू जाता है... खामोश पलों में दर्द और उम्मीद दोनों का एहसास कराता है।
'होमबाउंड' फिल्म रिव्यू
- फोटो : सोशल मीडिया
कमियां
फिल्म में कुछ बारीकी कमियां भी हैं। बीच-बीच में इसकी गति हल्की धीमी हो जाती है। जान्हवी कपूर का किरदार खूबसूरत है, मगर उसे और जगह दी जाती तो कहानी और बेहतर हो सकती थी। चूंकि यह फिल्म हल्की-फुल्की नहीं, बल्कि भारी और सोचने पर मजबूर करने वाली है, हर दर्शक के लिए आसान नहीं होगी।
'होमबाउंड' फिल्म रिव्यू
- फोटो : सोशल मीडिया
देखे कि नहीं
'होमबाउंड' जरूर देखनी चाहिए, क्योंकि यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि समाज का आईना है... जहां दोस्ती, जात-पात, धर्म और सपनों की जद्दोजहद एक साथ टकराते हैं। नीरज घेवान का निर्देशन हर सीन को असली और संवेदनशील बना देता है। हां, फिल्म थोड़ी धीमी और भारी लग सकती है, लेकिन अगर आप सिनेमा को सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एहसास और अनुभव मानते हैं, तो यह फिल्म आपके दिल में जरूर घर बना लेगी।