‘हिसाब बराबर’ कुछ कुछ आर के लक्ष्मण के कॉमन मैन की कहानी लगती है। कहने को कोई हैसियत नहीं लेकिन अड़ी पर आ जाए तो पूरा सिस्टम हिला सकता है। कहानी यहां भी कुछ कुछ वैसी ही है। रेलवे में टिकट जांचने वाले एक कर्मचारी को गणित की पहेलियां हल करने का शौक है। खाली समय में वह सीए की कोचिंग भी करता है। एक दिन उसे समझ आता है कि उसके खाते से 27 रुपये गायब हैं। वह बैंक जाता है। शिकायत करता है। बैंकवाले उसे ये शिकायत करने के इनाम में एक टेलीविजन गिफ्ट कर देते हैं। और, लोग भी शिकायतें लेकर जाते हैं, बैंक उन्हें भी गिफ्ट दे देता है। टीटीई का माथा ठनकता है। वह हिसाब लगाता है बैंक के चार करोड़ ग्राहकों का, जिनके खाते से अगर ये थोड़ी थोड़ी रकम ‘चुरा’ ली जाए तो घोटाला कितना बड़ा हो सकता है।
लेखक-निर्देशक अश्वनी धीर ने अपनी नई फिल्म ‘हिसाब बराबर’ की कॉपी बढ़िया पाई है। फिल्म का हिसाब लिखने के लिए पेंसिल, कलम, दवात भी वह बढ़िया ले आए हैं, लेकिन हिसाब जो है वह एक पन्ने पर ही अटका रह जाता है। जी हां, फिल्म के नायक की जो समस्या फिल्म शुरू होने के पहले 15 मिनट में ही समझ आ जाती है, उसे हल करने से कहानी का नायक ‘हीरो’ कैसे बनेगा, ये बताने के लिए अश्वनी धीर के पास आगे की कहानी नहीं है। या कहें कि दमदार कहानी नहीं है। ये एक शॉर्ट फिल्म लायक कहानी है जिस पर अश्वनी ने कोई ढाई घंटे से ज्यादा की फिल्म जियो स्टूडियो को चिटका दी है। जियो स्टूडियोज भी खिलाड़ी छोटा-मोटा नहीं है, उसने खुद अपने एप जियो सिनेमा पर रिलीज करने के इसे आगे जी5 को चिटका दिया है।
फिल्म ‘हिसाब बराबर’ की कहानी भी ऐसी ही है। पब्लिक एक दूसरे को चिटका रहा है। पुलिस अफसर अलग सेटिंग बना रहे हैं। लेडी बॉस फिल्म के हीरो की ठुकराई वह छोरी है जिसकी गणित कमजोर बताई गई। लेकिन जिंदगी के हिसाब में मामला हमेशा इतना ‘परफेक्ट’ होता नहीं है। फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी इसकी पटकथा ही है। संवाद फिर भी कहीं कहीं गुदगुदा जाते हैं, लेकिन औसत सी कहानी पर लिखा गया स्क्रीनप्ले फिल्म ‘हिसाब बराबर’ को बस औसत सी फिल्म का दर्जा ही दिला पाता है। कमजोरी यहां अश्वनी धीर के निर्देशन में भी साफ नजर आती है। एक तो उन्होंने कहानी का हीरो ऐसा लिया है जैसा ‘फिल्मी’ कहानियों में ही होता है। आम आदमी चाहे भी तो उससे रिश्ता बनाना मुश्किल है। फिल्म के संवाद भी अश्वनी धीर की पहचान रहे व्यंग्य और हास्य की जुगलबंदी नहीं करा पाते हैं।
कलाकारों में फिल्म के हीरो माधवन ने कोशिश पूरी की है, अपना सौ फीसदी देने की। अभिनेता वह कमाल के हैं, इसमें कोई शक नहीं। पहले ‘डिकपल्ड’, फिर ‘द रेलवे मेन’ और अब ‘हिसाब बराबर’, ओटीटी पर माधवन की टक्कर इन दिनों मनोज बाजपेयी की लोकप्रियता से की जा रही है। यहां माधवन इसलिए इक्कीस नजर आते हैं क्योंकि उनके पास तमिल का एक बड़ा दर्शक वर्ग अतिरिक्त रूप से भी है। लेकिन, कहानी का चयन करने में इस बार उनसे चूक हुई है। जियो स्टूडियोज की ही एक दूसरी फिल्म ‘स्काईफोर्स’ इसी शुक्रवार को सिनेमाघरों मे रिलीज हुई है लेकिन, जियो ने ‘हिसाब बराबर’ को सीधे ओटीटी पर रिलीज किया। मतलब उसे भी ये फिल्म सिनेमाघरों तक ले जाने लायक लगी नहीं। पूरी की पूरी फिल्म माधवन यहां अकेले अपने कंधों पर ढो रहे हैं, और आखिर आखिर तक आते आते वह भी हांफ जा रहे हैं।
फिल्म ‘हिसाब बराबर’ एक औसत सी कमजोर फिल्म है जिसे एक बार में पूरी देखना भी चुनौती से कम नहीं है। धीमी गति के समाचार सी चलती इस फिल्म में कीर्ति कुलहरि के किरदार का सस्पेंस सीधे थाने में खोलना भी गलत चाल रही फिल्म बनाने वालों की। लिखने वालों में इतने लोगों ने अलग अलग स्तरों पर इसे लिखा है कि ये फिल्म बनी भी किश्तों में ही दिखती है। कीर्ति कुलहरि, राजेश बैस कतई प्रभावित नहीं करते। नील नितिन मुकेश ने विलेन बनने की कोशिश अच्छी की है लेकिन अभिनय का अभ्यास उनका शायद इन दिनों ज्यादा है नहीं। गीत संगीत भी फिल्म का बस ऐंवई है। फिल्म खत्म होने के बाद न तो कोई गाना याद रहता है और न ही किसी गाने की धुन जहन में अटकने पाती है। बाकी तकनीती टीम ने भी बस अपना काम पूरा कर दिया है।