किसी कहानी में मुख्य किरदार का नाम ही हड्डी हो सकता है, ये सोचना ही ये फिल्म लिखने की चिंगारी रही होगी। फिल्म के निर्देशक अक्षय अजय शर्मा ने अदम्य भल्ला के साथ मिलकर फिल्म की पटकथा भी अच्छी सोची है, बस लिखा दोनों ने इसे इस तरह है कि फिल्म का असली रस इसके आखिरी तीस चालीस मिनटों में सिमट कर रह जाता है और फिल्म की लिखावट की ये कमजोरी ही इस फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी है क्योंकि यहां तक आने में दर्शकों को जिस धैर्य और साहस की जरूरत है, उतनी शायद आजकल के दर्शकों में अब शेष है नहीं। ओटीटी पर कौतुक करके दर्शक खींचने का फॉर्मूला अब जूठा हो चुका है। हर फिल्मकार इसमें अपने दांत गड़ा चुका है और ओटीटी पर कहानियों की इस बेढंगी चाल का ही असर है कि दर्शक अब सिनेमाघरों में लौटना शुरू हो चुके हैं।
फिल्म ‘हड्डी’ एक तरह से देखा जाए तो नवाजुद्दीन सिद्दीकी के अभिनय की वैसी ही शो रील है जैसी दर्शक उनकी कुछ चर्चित फिल्मों ‘ठाकरे’, ‘मंटो’, ‘मॉम’ और ‘रात अकेली है’ में देख चुके हैं। ओटीटी पर रिलीज हुई उनकी पिछली तमाम फिल्मों में एक बात एक जैसी है और वह ये कि ये फिल्म सिर्फ और सिर्फ नवाजुद्दीन सिद्दीकी के नाम को भुनाने की एक जैसी कोशिशें हैं। किन्नरों की मनोदशा समझने की कमर्शियल सिनेमा की कोशिशों में हाल फिलहाल के बड़े नामों अक्षय कुमार की फिल्म ‘लक्ष्मी’ और विजय सेतुपति की फिल्म ‘सुपर डीलक्स’ काफी चर्चा में रही हैं। उसके पहले ‘दायरा’ और ‘शबनम मौसी’ जैसी लीक से इतर फिल्मों ने निर्मल पांडे और आशुतोष राणा के लिए तारीफें बटोरी थीं। तारीफ फिल्म ‘हड्डी’ में नवाज की भी होना लाजिमी है, लेकिन फिल्म ये उतनी अच्छी नहीं बन पड़ी है।
नवाजुद्दीन सिद्दीकी के किरदार का ग्राफ यहां समयरेखा पर आगे पीछे चलने की बजाय अगर सीधी सरपट कहानी के रूप में सामने आया होता तो शायद इस फिल्म के दर्शकों की संख्या भी बढ़ती। अभी इस फिल्म के सहायक कलाकारों के आपसी समीकरणों के चलते ये फिल्म लंबे समय तक मूल मुद्दे से भटकी रहती है। कहानी ये हड्डी के प्रमोद अहलावत नामक माफिया से बदले की है लेकिन उसके पहले ये कहानी घाट घाट का पानी पीती रहती है। कलाकार भी इसमें नवाज के सिवा खास दमदार नहीं दिखे हैं। विपिन शर्मा की अदाकारी बहुत ही औसत है। चुन्ना बने श्रीधर दुबे, जोगी के किरदार में सहर्ष कुमार शुक्ला और सत्तो बने राजेश कुमार के किरदारों की अंतर्कथाएं भी पटकथा का हिस्सा होतीं तो ये फिल्म दर्शकों को और पसंद आती। इला अरुण ने फिल्म का दूसरा ध्रुव संभालने की कोशिश पूरी की है लेकिन उनके विपरीत ध्रुव की बागडोर थामे अनुराग कश्यप ने बतौर अभिनेता एक बार फिर खराब काम किया है।