फिल्म ‘गुठली लड्डू’ एक ऐसे परिवार की कहानी है जिसे लोग अपने पास भी नहीं बिठाना चाहते। जो समाज की गंदगी साफ करता है, उसका सम्मान करना बहुत बड़े दिल की बात होती है। आमतौर पर ऐसे कर्मचारियों और उनके परिजनों के साथ समाज में तिरस्कृत की तरह ही लोग पेश आते हैं और क्या हो जब ऐसे ही किसी परिवार का बच्चा पढ़ लिखकर अपना सामाजिक स्तर सुधारने का सपना देख ले? सवाल जितना आसान है, उसका जवाब कागजों पर उकेरने बैठेंगे तो 21वीं सदी में आ पहुंचे देश भारत में भी तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनने जा रहे लोगों का ये चेहरा डराता है।
गुठली फिर भी हार नहीं मानता। वह जाकर स्कूल के पास खड़ा हो जाता है। वह कलयुग का एकलव्य है। सुन सुनकर सीखता है और मौका मिले तो निशाना भी बिल्कुल सटीक लगा सकने की कूवत रखता है। लेकिन उसकी साधना में कुछ कुछ वैसा ही विघ्न आता है जैसे द्रोणाचार्य के कुत्ते ने एकलव्य की साधना में डाला था। लेकिन, उसके पहले वह अपनी साधना का साध्य लड्डू को बनाता है। गुठली के लिए लड्डू एक ऐसी काल्पनिक दुनिया है जिसमें वह दीवार पर ब्लैकबोर्ड बना सकता है, कक्षा में सुने पाठ दोहरा सकता है, और लड्डू के साथ इन सीखों का अभ्यास भीकर सकता है। साधना भंग होती है। घर तक शिकायत भी पहुंचती है लेकिन गुठली उगने की जिद पर अड़ा हुआ है। 'आई एम कलाम' अगर आपने देखी हो तो उसका अक्स आपको यहां गुठली के पिता में दिख सकता है। गुठली के पिता भी चाहते हैं कि गुठली पढ़ लिखकर बड़ा आदमी बने।
इस कहानी के द्रोणाचार्य स्कूल के प्रिंसिपल हरिशंकर हैं। लेकिन, इस बार वह अर्जुन के साथ न होकर एकलव्य के साथ हैं। संजय मिश्रा यह भूमिका निभा रहे हैं तो समझा जा सकता है कि उनके किरदार को ये कैसा अनगढ़ा रस अपने अभिनय में मिल गया है। संजय मिश्रा को देखकर ऐसा लगता है कि इनके अंदर अभी कितना अभिनय रस बाकी है। बस ऐसे निर्देशक चाहिए जो इस रस के नए नए छत्ते बना सकें और जरूरत पड़े तो उससे बिल्कुल ऑर्गेनिक शहद भी निकाल सकें। संजय मिश्रा का अभिनय ही फिल्म ‘गुठली लड्डू’ की जान है। 50 से ज्यादा फिल्म समारोहों में सम्मानित हो चुकी इस फिल्म को अयोध्या, उदयपुर, गोरखपुर, कोलकाता और झारखंड से लेकर लंदन तक के लोग देख चुके हैं। इन शहरों के फिल्म समारोहों मे इसे सम्मान भी खूब मिला है।
फिल्म ‘गुठली लड्डू’ में गुठली का किरदार निभाने वाले बच्चे धनंजय सेठ ने अपनी अदाकारी से सबका दिल जीत जीत लिया है। खालिस बाल कलाकारों का हिंदी सिनेमा में इन दिनों खासा अकाल है। निर्देशक कहानी भी तलाश रहे हैं और इन कहानियों के लिए उम्दा कलाकार भी। धनंजय की ट्रेनिंग फिल्म शुरू होने से पहले अच्छे से की गई है और इसका असर भी परदे पर दिखता है। गुठली के पिता मंगरू की भूमिका में सुब्रत दत्ता, बुधिया की भूमिका में कंचन पगारे, गुठली के दोस्त लड्डू की भूमिका में हीत शर्मा, गुठली की मां की भूमिका में कल्याणी मुले और लड्डू की मां की भूमिका में अर्चना पटेल का सहज अभिनय प्रभावित करता है।
ये तो थी फिल्म की ढेर सारी अच्छी बातें। और, अब कुछ बातें वे जिनके बारे में ये फिल्म बनाने वालों को अपनी अगली फिल्म में गौर भी करना चाहिए और बजट मिले तो इसे बेहतर भी करना चाहिए। गणेश पंडित, श्रीनिवास अब्रोल और इशरत के मिले जुले प्रयास से बनी फिल्म की पटकथा के संवाद बुंदेली बोली में हैं और बहुत अच्छे बन पड़े हैं। लेकिन, जब किरदार ये संवाद परदे पर बोल रहे होते हैं तो पीछे का वातावरण बुंदेलखंडी नहीं दिखता। फिल्म से दर्शक का पहला संवाद यहीं टूटता है। प्रोडक्शन डिजाइनर सारा इशरत खान फिल्म ‘गुठली लड्डू’ की आत्मा समझ नहीं पाईं।
तकनीकी रूप से भी फिल्म ‘गुठली लड्डू’ बेहतर फिल्म बन सकती थी। जितनी मेहनत कॉस्ट्यूम डिजाइनर सागर त्रिलोत्कर ने किरदारों के मुताबिक कलाकारों की वेशभूषा तैयार करने में की है, उतनी ही मेहनत फिल्म की सिनेमैटोग्राफी, संपादन और संगीत में होती तो फिल्म का आनंद ही कुछ और होता। इशरत आर खान ने ये फिल्म बहुत ही दिल से बनाई है और फिल्म देखने पहुंचे लोगों के दिल भी इससे जीते हैं। बस दिल दुखाने वाली बात ऐसी फिल्मों के लिए यही है कि देश में स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं की फिल्में अधिकाधिक दर्शकों तक पहुंचाने की कोई नीति अभी तक फिल्म काराबोर के नियंताओं के आम की गुठली जैसी भाई नहीं है।