गन्स एंड गुलाब्स रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अफीम की दुनिया के चार चमन बहार
राज और डीके का नेटफ्लिक्स से पहला नाता वेब सीरीज ‘गन्स एंड गुलाब्स’ में बना है। कहानी एक चौकड़ी की है जिनके चारों तरफ एक काल्पनिक दुनिया 90 के दशक की सजाई गई है। हालांकि सीरीज के एंड क्रेडिट्स में शैलेंद्र सिंह का 1981 में रिलीज फिल्म ‘जमाने को दिखाना है’ का गाना ‘होगा तुमसे प्यारा कौन’ सुनकर मन करने लगता है कि काश, कहानी थोड़ी और पीछे भी जा सकती। खैर, बात चौकड़ी की करते हैं। अफीम के खेतों वाले छोटे से दो कस्बों की ये कहानी वहां से शुरू होती है जहां चार कट आत्माराम बेरहमी से एक कत्ल करता है। जो मारा गया वह भी इलाके का बदनाम क्रिमिनल है। मोटरसाइकिल की मरम्मत करने वाला उसका मैकेनिक बेटा नकली आंसू बहाने की कोशिश कर रहा है। इलाके के अफीम सौदागर का अपने बेटे और लाव लश्कर के साथ जनाजे में पहुंचता है। और, उधर दामिनी में ऋषि कपूर के गाने सी एंट्री होती है इलाके के नारकोटिक्स अफसर की। अब कहानी के ये चारों किरदार कैसे एक दूसरे का रास्ता काटते हैं, इसी पर बनी है वेब सीरीज ‘गन्स एंड गुलाब्स’ । बीच में एक स्कूल भी है जिसके कुछ लड़के स्कूल की इंग्लिश टीचर पर फिदा है। और, ये टीजर फिदा है मोटरसाइकिल मैकेनिक पर। उसकी तंदुरूस्ती देखकर नहीं, उसके हाथों हुए दो कत्ल की चर्चा सुनकर।
इसे भी पढ़ें- Taali: अपने बेबाक बयानों की वजह से मैगजीन कवर से दूर रहीं सुष्मिता सेन, वर्षों बाद अभिनेत्री का बड़ा खुलासा
गन्स एंड गुलाब्स रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
चार दशक पहले की कहानी
90 के दशक में जवान हुए लोगों को उस दौर की तमाम झलकियां वेब सीरीज ‘गन्स एंड गुलाब्स’ में देखने को मिलेंगी। ब्रायन एडम्स के एक गाने का तड़का भी हिंदी हिट गानो के बीच लगा है। मैं बार बार ये लिखता रहा हूं कि अगर कहानी का वातावरण सही तरीके से सेट कर दिया जाए तो किरदारों से दर्शकों का तारतम्य बिठाने में इससे मददगार और कोई चीज फिल्ममेंकिंग में नहीं होती। ‘शोले’ के रामगढ़ से लेकर वेब सीरीज ‘गन्स एंड गुलाब्स’ तक ये बात साबित भी होती है। राज और डीके ने हालांकि संवादों में गालियां मिलाने की अपनी जिद यहां भी कायम रखी है और इसके चलते पारिवारिक माहौल में स्मार्ट टीवी पर सीरीज देखते समय चौकन्ना भी रहना होता है लेकिन इस बार मामला ‘फर्जी’ से बेहतर है। यहां शाहिद कपूर और विजय सेतुपति जैसे अपने नाम का सिक्का चला चुके सितारे तो नहीं हैं लेकिन कहानी की खटिया के चारों पाए राजकुमार, दुलकर, आदर्श और गुलशन ने मजबूती से संभाल रखे हैं।
गन्स एंड गुलाब्स रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
राजकुमार और दुलकर के बड़े दांव
राजकुमार राव के लिए बड़े परदे पर जो काम मुश्किल दिखता है, वह काम ये यहां बखूबी कर ले जाते हैं। उनका टीपू पाना का किरदार हालात के मजे ले रहा है। अपनी माशूक को खुशबू वाला लव लेटर लिखवाने की उसकी कसक से कहानी का रोमांस सजता है। दुलकर का ऑफिसर अर्जुन का किरदार कड़क है। बीवी उसकी खूबसूरत है और बिटिया होशियार। उसकी पारिवारिक कहानी में एक एंगल बिना बुलाए चली आई प्रेमिका की भी है। फिल्म ‘सीता रामम’ के बाद से दुलकर का हिंदी इलाकों में अच्छा बाजार सजा है। अभिनय यहां भी उन्होंने अच्छा किया है। कहानी को ऐन वक्त पर पेंच लड़ाने का मौका भी उनके किरदार को ही मिलता है। चार कट आत्माराम में गुलशन देवैया ‘खलनायक’ बने हैं। वैसा ही रूप और आंखों में जिंदगी से बेजार हो चुके इंसान का वैसा ही गुस्सा। आदर्श गौरव अफीम माफिया के सरगना के बेटे के किरदार में हैं। वारिस बनने के लिए लड़के होने की चाहत से उसका भविष्य लिखा गया है, लेकिन आखिर में जाकर जब उसकी असली चाहत खुलती है तो मामला थोड़ा पटरी से उतर जाता है।
गन्स एंड गुलाब्स रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
टी जे भानु को मिला सबसे बड़ा मौका
वेब सीरीज ‘गन्स एंड गुलाब्स’ मूल रूप से पुरुष किरदारों के इर्द गिर्द ही बुनी गई कहानी है। लेकिन, अपने अपने अभिभावकों से नाखुश दिखते इन किरदारों के बीच एक अंतर्कथा प्रेम की भी है। फिल्म ‘अफवाह’ में पुलिस कांस्टेबल के रूप में दिखी टी जे भानु यहां इंग्लिश टीचर चंद्रलेखा बनी हैं। वह अभिनय पर ही फोकस रखे हुए हैं। उनकी काया हिंदी सिनेमा की हीरोइनों की चर्चित परिभाषा से भिन्न है। स्मिता पाटिल और नंदिता दास के अभिनय के बीच में कहीं अपनी एक अलग लकीर बनाने की कोशिश में वह कामयाब दिखती हैं। सतीश कौशिक अफीम माफिया के सरगना के किरदार में हैं। दुनिया को अलविदा कह चुके सतीश को परदे पर देखना ही एक अलग ही हूक इस सीरीज को देखते समय दिल में पैदा करता है। वह कमाल के कलाकार रहे हैं। किस्से उनके पास और कमाल के हुआ करते थे। पूजा गौर, विपिन शर्मा और श्रेया धन्वंतरि के पास इन किरदारों के आभामंडल का तेज साधे रहने की जिम्मेदारी है और इसे इन लोगों ने निभाया भी पूरी ईमानदारी से है।
गन्स एंड गुलाब्स रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
ये कश्ती वहां डूबी जहां पानी कम था...
राज और डीके की कहानी कहने की कला में एक सूत्र दिमागी पहेलियों का शुरू से चलता आ रहा है। वह सजग दर्शकों के फिल्मकार हैं। उनकी कहानी कब हिचकोले लेकर एक नई पगडंडी पकड़ ले, इसके लिए दर्शक को सतर्क रहना होता है। वेब सीरीज ‘गन्स एंड गुलाब्स’ में भी छह एपिसोड तक अच्छी खासी चलती सीरीज जब सातवें और आठवें एपिसोड को एक साथ मिलाकर पहेलियां दर पहेलियां बुनने की कोशिश करती है तो हृदयगति सी ऊपर नीचे जाती समयरेखा का गुणा भाग रख पाना आम दर्शक के लिए कठिन प्रतीत होता है। अमन पंत का संगीत मामले को संभाले रखने की पूरी कोशिश करता है लेकिन मूल रूप से शायद अंग्रेजी में लिखे गए संवादों का हिंदी रूपांतरण करने में सुमित अरोड़ा ने राज और डीके की गालियों का अनुराग कश्यप मार्का केचप बना दिया है। सीरीज से गालियां निकाल दी जाएं तो इसे आधा स्टार और दिया जा सकता है लेकिन फिलहाल मामला तीन पर ही सेटल करना ठीक रहेगा। इसमें भी आधा स्टार सीरीज के एंड क्रेडिट्स का है।