तीन पीढ़ियों के बिगड़ते रिश्ते
फिल्म ‘गुलमोहर’ को दर्शकों तक पहुंचाने का जिम्मा उसी स्टार स्टूडियोज ने संभाल रखा है जिसकी पिछली फिल्म ‘सेल्फी’ ने बॉक्स ऑफिस पर पानी तक नहीं मांगा। अच्छा ही हुआ कि उसने इस ‘गुलमोहर’ को ओटीटी पर खिलाया है। एक संभ्रांत से दिखने वाले बत्रा परिवार की अंदरूनी दिक्कतों को बयां करती इस फिल्म से शर्मिला टैगोर की अरसे बाद कैमरे के सामने वापसी हुई है। वह परिवार की मुखिया हैं। देवर उनको ताने मारता है कि बत्रा परिवार की बहू अपने पोते पोतियों के साथ शराब पिये, ये ठीक नहीं है। बेटा श्रवण कुमार सा आज्ञाकारी है लेकिन अपनी संतानों की पसंद से परेशान भी है। बत्रा परिवार के रिश्ते दरक रहे हैं। तीन पीढ़ियों की एक छत के नीचे से निकली ये कहानी अब अपने अपने घरों को जाना चाहती है। दादी चाहती हैं कि पुश्तैनी घर छोड़ने से पहले होली सब साथ में मना लें। साथ में रहने की ख्वाहिश इस घर में काम करने वालों की भी है। एक खाना बनाने वाली है जिसके हाथ से मंदिर में बैठे भगवान उठाए जाने पर सवाल उठता है। पैकिंग करने वाली कंपनी का सुपरवाइजर इसका पुराना दोस्त निकलता है। इधर घर की साज संभाल करते रहे बंदे को भी इस खाना बनाने वाली से प्यार है। अमीर गरीब की खाई में पनपते प्रेम त्रिकोण में सामाजिक बेचैनियां भी हैं और रिश्तों की दरकती सच्चाइयां भी। बस जो नहीं है वह है इस कहानी को क्लाइमेक्स तक बांध कर रख पाने वाली एक पटकथा।
मनोज बाजपेयी फिर बेचैन आत्मा
फिल्म ‘गुलमोहर’ की असल कमजोरी इसकी धीमी और बिखरी बिखरी सी पटकथा ही है। कहानी सही है और इसमें मूल कहानी के साथ साथ चलती क्षेपक कथाएं भी दिलचस्पी जगाती हैं लेकिन ये क्षेपक कथाएं मूल कहानी का रस बढ़ाने की बजाय उसका असर उतारती रहती हैं। दिल्ली की पृष्ठभूमि में खिली फिल्म ‘गुलमोहर’ बदलते मौसमों की बानगी है। मौसम सिर्फ गुलमोहर के खिलने का ही नहीं है। मौसम मनोज बाजपेयी जैसे काबिल कलाकार के ‘फैमिली मैन’ में किशोर बच्चों का पिता बनने के बाद अब कामकाजी बच्चों के पिता बनने का भी आ गया है। एक रईस परिवार के वारिस के किरदार में मनोज बाजपेयी खटकें नहीं सो फिल्म के क्लाइमेक्स में उसे भी सही करने की एक कोशिश है और वही फिल्म का असल संदेश भी है। फिल्म ‘गुलमोहर’ देखने की असल वजह भी मनोज बाजपेयी ही रहे लेकिन मनोज को एक बेचैन, उग्र और सिस्टम से लड़ते किरदार में देखने का जो मजा है, वैसा मजा उनको एक फैमिली ड्रामा के बेचैन बाप के रूप में देखने में कम ही आता है।
शर्मिला टैगोर का आभामयी अभिनय
शर्मिला टैगोर उस दौर की महिला के किरदार में हैं जब शायद महिला सशक्तिकरण के बीज भारतीय समाज के रईस परिवारों में पौधे बनने शुरू हो चुके थे। नाम भी बिल्कुल सही रखा है कुसम। कुसुम अपने फैसले खुद लेना जानती है। पोती से शराब मांगने में उसे हिचक नहीं है। दरअसल दादी और पोती वाली ये क्षेपक कथा इस फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष है। शर्मिला टैगोर का अपना आभामंडल है। वह परदे पर जब भी आती हैं अपनी तरफ आकर्षित करती हैं। कुसुम का अपने बेटे अरुण से रिश्ता भी रोचक है। बेटा अपनी मां का हर कहना मानता है। उसके फैसले पर सवाल नहीं करता है। बिल्कुल इनदिनों 50 के आसपास की उम्र वाले लोगों की तरह। ये 50 के आसपास वाली पीढ़ी भी कमाल है। पहले मां-बाप की आज्ञाकारी बनी रही। अब बच्चों की ‘आज्ञाओं’ में ढलने की कोशिश कर रही है। अपनी मर्जी के ये कभी हो ही नहीं पाए।
नई सदी में खिलता नया ‘गुलमोहर’
फिल्म ‘गुलमोहर’ का उनवान ये है कि घर की जिम्मेदारियों से मुक्त हो चुकी कुसुम अब अपनी मर्जी से बाकी जिंदगी जीना चाहती है। अकेले और वह भी पुदुचेरी जाकर। अकेलेपन में एक साथी तलाशते इंसान के किरदार में जतिन गोस्वामी का अभिनय कमाल का है। दिल की बात जुबां पर लाने से कतराते इस इंसान का रेशमा के पुराने दोस्त के कहानी में आते ही बेचैन हो जाना कहानी का अच्छा ट्विस्ट है। चंदन रॉय भी हैं बीच बीच में हंसी की फुलझड़ियां छोड़ने के लिए। लेकिन, इतने सारे किरदार कैनवस पर लाने के बाद इनको अलग अलग रंगों में संजोने के चक्कर में निर्देशक राहुल चिटेला वैसी मास्टरी दिखाने से चूक गए जिसकी इस तरह की मल्टी स्टारर फिल्मों में जरूरत होती है। फिल्म ‘रॉकेट्री द नंबी इफेक्ट’ में माधवन की पत्नी का किरदार करने वाली सिमरन को फिर से देखना फिल्म ‘गुलमोहर’ का एक सुखद एहसास है। सिमरन को हिंदी सिनेमा में और मौके दिए जाने की जरूरत है। कैमरे के सामने सिर्फ उनकी मौजूदगी बहुत कुछ संभाल ले जाती है।