महिला प्रधान फिल्मों से भावुक ड्रामे की उम्मीद की जाती है। यह भी माना जाता है कि इनके बॉक्स ऑफिस पर चलने की कोई गारंटी नहीं। लेकिन ‘गुलाब गैंग’ इन दोनों बातों के विपरीत है और कई मिथकों को तोड़ती है।
यह ऐक्शन से भरपूर महिला प्रधान फिल्म है। जिसमें नायिकाएं लाठियां, खंजर और भाले चलाती हैं। दुश्मनों को उठा कर पटकती हैं। निर्देशक सौमिक सेन ने न केवल कथानक को बारीकी से बुना है, बल्कि फिल्म पर अपनी पकड़ भी बनाए रखी है। उनके रचे दृश्य बांधे रखते हैं।
उत्तर भारत के एक गांव माधवपुर में रज्जो देवी (माधुरी दीक्षित) महिलाओं का आश्रम चलाती हैं। यहां महिलाएं गुलाबी साड़ियां बुनती हैं और यही पहनती हैं। यह ‘गुलाब गैंग’ है। ये महिलाएं अबला नहीं हैं।
गांव की महिलाओं पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ कमर कसती हैं। ईंट का जवाब पत्थर से देती हैं। आश्रम रज्जो देवी के सपनों की नर्सरी भी है। वह महिलाओं और बच्चियों को पैरों पर खड़ा करना चाहती हैं।
गांव में स्कूल खोलना चाहती हैं। लेकिन तरक्की के हाइवे तक पहुंचने के लिए हमेशा कांटों भरी पगड़डियों का सफर तय करना पड़ता है। ‘गुलाब गैंग’ के सामने भी बड़ी चुनौती है। गांव का नेता पवन शंकर और उसकी लीडर सुमित्रा देवी (जूही चावला)। सुमित्रा देवी चालाक है। रज्जो की लोकप्रियता सुमित्रा देवी को हिला देती है और बड़ी जंग का मैदान तैयार होता है।
माधुरी और जूही फिल्म की जान हैं। दोनों को पर्दे पर एक साथ देखना सुखद है। रज्जो की भूमिका में माधुरी जहां बहुत अनुशासित नजर आती हैं, वहीं काइयां राजनेता के रोल में जूही चौंकाती हैं।
उनकी प्रतिभा का यह पक्ष अभी तक उजागर नहीं हुआ था। फिल्म में ऐक्शन दृश्यों पर कड़ी मेहनत की गई है और वे खूबसूरत बने हैं। यहां दो पक्षों की सीधी टक्कर है, इसलिए संवाद अहम हैं। कई तो आपको याद रह जाते हैं। जैसेः ‘जिंदगी किस्मत और टाइमिंग का खेल है।’ ‘बीवी छोड़ दिए, बीड़ी छोड़ दिए... फिर पकड़ के क्या रखे हो...?’ ‘टांगों के बीच में ऐसी लात मारेंगे कि सारी जिंदगी आंखों से मूतोगे...।’
‘संगठन में शक्ति है, अकेले में आपकी फटती है...।’ और ‘घर के कचरे को घर में जलाने से मना किया है पवन बाबू ताकि हमारी आंख में धुआं ना लगे...।’ फिल्म में बुराई के खिलाफ अच्छाई की जंग है। यह लीक से हट कर एक अलग अनुभव।