फिल्म ‘घूमर’ का जो सार है, वही बाल्की के सिनेमा का विस्तार है। उनका सिनेमा लॉजिक का खेल नहीं, उनका खेल मैजिक का है। जादू जो वह अपने किरदारों के इर्द गिर्द रचते हैं। पिता की उम्र के शेफ से मोहब्बत से जिंदगी में चीनी कम नहीं होती बल्कि जीने की मिठास बढ़ती है, वैसे ही जैसे अपने पिता के पिता का रोल करते अभिषेक बच्चन के जीने की कला फिल्म ‘पा’ के बाद शर्तिया बदली होगी। यूं लगता है जैसे अभिषेक बच्चन ने मान लिया है कि वह हिंदी सिनेमा के हाशिये पर जा रहे हैं। उनके हाव भाव अब वैसे ही हैं। बीते साल उनके जन्मदिन पर शुरू हुई इस फिल्म का पहला लुक बीते साल ही मानसून के मौसम में आ गया था। फिल्म जितनी तेजी से बनी, उतनी ही धीमी गति से रिलीज हुई। अभी बीते 13 अगस्त को दुनिया भर में खब्बू दिवस यानी लेफ्ट हैंड डे मनाया गया। और, 18 अगस्त को सामने आ रही है एक खब्बू गेंदबाज की कहानी।
फिल्म ‘घूमर’ एक जिद्दी इंसान और एक हिम्मत हारती युवती की कहानी है। क्रिकेट उनका मिलन बिंदु है। ये मिलन विशुद्ध व्यावसायिक है। एक द्रोणाचार्य अपना खुद का अंगूठा काटने के दर्द की दवा उस एकलव्य में तलाश रहा है जिसका अंगूठा तो क्या पूरा दाहिना हाथ जिंदगी की नाइंसाफियों में होम हो चुका है। दोनों जिन हालात में टकराते हैं, वह एक चिंगारी है। दोनों के भीतर राख भरी हुई है। इस राख को बारूद बनाने का काम करने के लिए यहां शत्रुघ्न सिन्हा तो नहीं है लेकिन आर बाल्की ने इस जमाने के एक असल एकलव्य (निशानेबाज) करोली टकाक्स की कहानी को क्रिकेट के मैदान में कपड़े बदलकर पहुंचा दिया है। बाल्की की अपनी फिल्मोग्राफी गवाह है कि जब वह मूल विचार लाते हैं तो कमाल करते हैं और जब वह किसी से मिले विचार पर फिल्म बनाते हैं तो कमाल इस बात का करते हैं कि उनकी कहानी कहने की कला के जादू में कलाकार बंधे चले आते हैं।
सैयामी खेर अभिनेत्री बनने से पहले क्रिकेटर ही बनना चाहती थीं। संयोग उन्हें सिनेमा मे लाया और जिंदगी लाई उन्हें एक ऐसे मोड़ पर जहां उनका नीली जर्सी पहनने का सपना भी पूरा हो गया, असल में न सही सिनेमा में ही सही। फिल्म ‘घूमर’ कमाल की बल्लेबाज के दाहिना हाथ गंवाने के बाद बाएं हाथ की गेंदबाज बनने की रोचक कहानी है। बाल्की ने राहुल और ऋषि के साथ मिलकर लिखा भी इसे दिमाग लगाकर अच्छे तरीके से है लेकिन थियेटर जो है ना वह दिल से कारोबार करता है, वह तब और मुश्किल हो जाता है जब मुकाबले में हंगामाखेज फिल्म ‘गदर 2’ सुस्ताने का नाम ही न ले रही हो। ओटीटी संचालकों ने बन चुकी फिल्मों को सीधे खरीदने के लिए अपना एक गुप्त फॉर्मूला सेट कर रखा है जिसमें ‘बवाल’ इन है और ‘घूमर’ आउट। सो अभिषेक बच्चन को सिनेमाघरों से होकर ओटीटी तक पहुंचना है। उनकी अपनी कंपनी सरस्वती एंटरटेनमेंट फिल्म की प्रोड्यूसर है।
अभिषेक बच्चन के अभिनय करने का अपना एक नपा तुला खाका है। वह रोल में घुसने के लिए किसी वैसे ही असल किरदार को पढ़ते समझते नहीं हैं। वह बस निर्देशक के इशारों पर घूमना चाहते हैं। मेहनत वह कम नहीं करते हैं। ‘युवा’ और ‘गुरु’ जैसी फिल्मों में वह चमत्कार सरीखा भी कर जाते हैं, लेकिन ‘मनमर्जियां’ में वह मजे लेते दिखते रहते हैं। वह चाबुक पर नाचने वाले सर्कस के ऐसे शेर है जिसके लिए रिंग मास्टर का बेइंतहा काबिल होना जरूरी है। फिल्म ‘घूमर’ में वह इन दोनों के बीच कहीं हैं। उनके भीतर छिपे अभिनय के तमाम रंग बाल्की ने इस फिल्म में निचोड़ लिए हैं। मोनोलॉग किसी अभिनेता की काबिलियत ही है, पर अगर 75 साल पहले रिलीज फिल्म ‘आग’ में बालक शशि कपूर का मोनोलॉग एक बार देख लें तो फिर कार्तिक से लेकर अभिषेक सबके मोनोलॉग टपकते से दिखते हैं। अभिषेक ने फिर एक बार अपने किरदार को लेकर मेहनत खूब की है। बस दिक्कत ये है कि ये मेहनत परदे पर दिखने लगती है।
फिल्म ‘घूमर’ एक तरह से सैयामी खेर की फिल्म है। शबाना आजमी का आत्मनिर्भर और आंकड़ों की बाजीगर सा किरदार उनकी नींव में मिट्टी भरता है। इस मिट्टी को कसके गूंथने का काम अंगद बेदी के पास है और फिर इस लोंदे को आकार मिलता है अभिषेक के किरदार से। सैयामी अच्छी अभिनेत्री हैं इसमें कोई शक नहीं। यहां भी उनका और अभिषेक का टकराव फिल्म की शान है। दोनों की केमिस्ट्री भी वैसी ही शानदार है जैसी फिल्म ‘साला खड़ूस’ में आर माधवन और ऋतिका सिंह की रही है। बाल्की की फिल्म हिचकोले वहां खाती है जहां ये अपने अंतिम अध्याय की तरफ बढ़ती है। क्रिकेट पर बनी तमाम फिल्मों की तरह हालांकि ये फिल्म इसके आंकड़ों में नहीं उलझती है लेकिन महिला क्रिकेट की ‘टीआरपी’ बड़े परदे पर बनने में अभी समय लगेगा।