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Gandhi Godse Ek Yudh Review: संतोषी की सियासी फिल्म रही बेअसर, दीपक और चिन्मय की मेहनत पर फिरा पानी

Thu, 26 Jan 2023 01:03 PM IST
मेघा चौधरी अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

सार

'गांधी गोडसे एक युद्ध' पूरी तरह से गांधी और गोडसे की बातचीत पर आधरित है और इस फिल्म में यह बताने की कोशिश की गई है कि अगर ऐसा हुआ होता तो क्या हुआ होता?
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गांधी गोडसे एक युद्ध - फोटो : सोशल मीडिया
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Movie Review
गांधी गोडसे एक युद्ध
कलाकार
दीपक अंतानी , चिन्मय मंडलेकर , तनीषा संतोषी और अनुज सैनी आदि
लेखक
राजकुमार संतोषी और असगर वजाहत
निर्देशक
राजकुमार संतोषी
निर्माता
मनिला संतोषी
रिलीज डेट
26 जनवरी 2023
रेटिंग
2/5

विस्तार
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महात्मा गांधी और नाथूराम गोडसे की मुलाकात कभी नहीं हुई, लेकिन 'गांधी गोडसे एक युद्ध' में वही दिखाया गया है कि अगर गांधी गोली लगने के बाद बच गए होते तो क्या होता? अगर महत्मा गांधी और गोडसे की मुलाकात हुई होती तो उनके बीच किस किस तरह की बात होती। फिल्म का विषय थोड़ा अलग है लेकिन मुद्दा वही दिखाया गया है। ये फिल्म हॉलीवुड से शुरू हुए नए प्रयोग ‘व्हाट इफ’ जैसी फिल्म है। मतलब ये कि इतिहास की एक ऐसी घटना सोचना जो घटित ही नहीं हुई। कहानी देश के बंटवारे से शुरू होती है। गांधी आमरण अनशन पर हैं। गोडसे को लगता है कि गांधी मुसलमानों का पक्ष ले रहे हैं और अगर वह जिंदा रहेंगे तो वह आमरण अनशन के जरिए लोगो से अपनी बात मनवाते रहेंगे।  

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गांधी गोडसे एक युद्ध - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म को कल्पना में ले जाया जाता है। गांधी को गोली लगती है, लेकिन वह बच जाते हैं। फिर शुरू होता है, गोडसे से मुलाकातों का सिलसिला। वह गोडसे को माफ कर देते हैं और उससे मिलने जेल जाते है। गांधी की अपनी एक अलग विचार धारा है और गोडसे की अपनी एक अलग विचारधारा। देश को आजादी मिल चुकी थी, लेकिन अभी भी असल मायने में लोग आजाद नहीं हुए थे। गांधी ग्राम स्वराज की स्थापना करते है और गांव के पिछड़े दलित लोगों की भलाई के लिए एक मुहिम शुरू करते हैं। कहा जाने लगा कि देश में दो सरकारें चल रही हैं, एक दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू चला रहे हैं तो एक बिहार के किसी गांव के एक कोने में बैठे गांधी। गांधी चाहते हैं कि उनको उसी जेल में बंद किया जाए जहां पर गोडसे को बंद किया गया है।

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गांधी गोडसे एक युद्ध - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म की कहानी के मुताबिक गांधी को अपनी बैरक में देख गोडसे चौंकता है। 'गांधी गोडसे एक युद्ध' पूरी तरह से गांधी और गोडसे की बातचीत पर आधरित है और इस फिल्म में यह बताने की कोशिश की गई है कि अगर ऐसा हुआ होता तो क्या हुआ होता? अगर गांधी से गोडसे की पहले मुलाकात हुई होती तो शायद वह गांधी को नहीं मारता। फिल्म चूंकि संवादों पर ही पूरी तरह आधारित है तो ये फिल्म न लगकर पूरे समय दो लोगों का संवाद ही रहती है। संतोषी इसके लिए कलाकारों का चयन अपने हिसाब से बहुत सही किया है लेकिन चूंकि दोनों चेहरे हिंदी सिनेमा के लिए अनजाने हैं, लिहाजा वे दर्शकों का ध्यान खींच पाने में विफल हैं।
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गांधी गोडसे एक युद्ध - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
कलाकारों के नजरिये से देखें तो गांधी की भूमिका में दीपक अंतानी ने  बढ़िया काम किया है। गांधी के किरदार को उन्होंने पूरी तरह से जिया है। गोडसे की भूमिका में चिन्मय मंडलेकर भी पूरी तरह से फिट हैं। बस दिक्कत दोनों के साथ एक ही है कि वह सिनेमाई करिश्मा नहीं रखते हैं। गांधी और गोडसे के इन किरदारों को निभाने वाले कलाकारों ने आपसी तालमेल बढ़िया दिखाया है। राजकुमार संतोषी की बेटी तनीषा संतोषी की भी इस फिल्म से सिनेमा में बोहनी हो गई है। काम उनका भी प्रभावी है। लेकिन, यही बात राजकुमार संतोषी के निर्देशन के बारे में नहीं कही जा सकती। बड़े परदे पर उनकी वापसी उतनी प्रभाव नहीं रही। फिल्म देखकर लगता है कि वह अब भी ‘द लीजेंड ऑफ भगत सिंह’ वाले समयकाल में ही अटके हैं। फिल्म का विषय सियासी है। फिल्मों से भी सियासत होती है, ये इस फिल्म से एक बार फिर साबित होता है।
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