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फिल्म समीक्षा/फोबियाः बचके रहिए, ये डर आपके दिमाग में उतर सकता है!

Sat, 28 May 2016 03:59 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला, मुंबई
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निर्माताः विकी राजानी/सुनील लुल्ला
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निर्देशकः पवन कृपलानी
सितारेः राधिका आप्टे, सत्यदीप मिश्रा
रेटिंग **1/2

क्या ऐसा हो सकता है कि भविष्य में होने वाली घटना किसी को पहले दिख जाए? कहते हैं कि कभी कभी कुछ लोगों ने यह अनुभव किया है। जिनके साथ ऐसा नहीं हुआ, उनके लिए इस पर विश्वास करना कठिन है। फोबिया को देखते हुए भी आप कुछ ऐसी मुश्किल से गुजरते हैं। कठिनाई तब और बढ़ती है जब फिल्म के टाइटल पर विश्वास कर बैठते हैं।

फोबिया मतलब होता है, डर। फिल्म की नायिका एगोराफोबिया से ग्रस्त है। यह ऐसी मानसिक दशा है जिसमें इंसान को खुली/अनजान जगहों से डर लगता है। व्यक्ति शॉपिंग मॉल और एयरपोर्ट से भी डरता है। दुनिया के कई लेखक, संगीतज्ञ, अभिनेता इस फोबिया के शिकार रहे हैं। हालांकि इस सूची में कोई भारतीय नाम नहीं मिलता। वैसे, फोबिया की नायिका महक (राधिका आप्टे) चित्रकार है।
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महक आधी रात को एक पार्टी से लौट रही है और टैक्सी ड्राइवर उससे रेप की कोशिश करता है। महक खुद को बचा तो लेती है मगर एगोराफोबिया की शिकार बन जाती है। इस संकट में बॉयफ्रेंड (सत्यदीप मिश्रा) उसके साथ है। वह महक को तीन कमरों के जिस फ्लैट में रहने ले जाता है, वहां अचानक ऐसी घटनाएं होती हैं जो महक की समस्या और बढ़ा देती है। क्या महक कुछ घटनाओं की कल्पना कर रही है या सचमुच कोई पारलौकिक मामला है?

निर्देशक पवन कृपलानी दर्शक को बांधने की कोशिश करते हैं, परंतु दूसरे हिस्से में एक वक्त के बाद ही उन्हें कामयाबी मिल पाती है। पहले हिस्से में महक की तमाम बातें लंबे दोहराव की तरह लगती हैं। कुछ जगहों पर आप ऊब भी सकते हैं।
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राधिका आप्टे की खूबसूरती नहीं दिखती

फोबिया की सकारात्मक बात यह है कि निर्देशक ने कहानी को कुछ नए ढंग से कहने का प्रयास किया है। वह साइको-थ्रिलर फिल्मों में आम तौर पर दिखाए जाने वाले भूत-प्रेत कनेक्शन को खूबसूरती से हंसी-हंसी में उड़ा देते हैं। इस लिहाज से फोबिया अलग है। परंतु उसे दूसरी फिल्मों से अलग बनाने वाला यह बिंदु बहुत देर से आता है... और उसके बाद कुछ विशेष बचता नहीं। पवन ने इससे पहले रागिनी एमएमएस और डर एट द मॉल जैसी हॉरर फिल्में बनाई हैं। इस बार उन्होंने मनुष्य के मस्तिष्क में प्रवेश किया है। स्क्रिप्ट की बुनावट अधिक रोचक तथा कसी हुई होती तो फिल्म के लिए बेहतर होता। यहां कुछ बातें गले नहीं उतरतीं और ड्रामाई लगती हैं।

राधिका आप्टे अगर आपको खूबसूरत लगती हैं तो इस फिल्म में निराश करेंगी। डरी, सहमी, आशंकित राधिका के चेहरे पर अधिक हाव-भाव नहीं आते और वह पूरे समय एक ही लहर पर सवार रहती हैं। विविधता गायब है। जबकि सत्यदीप मिश्रा बार-बार ब्रेक लेकर लौटने के बावजूद प्रभावित करते हैं। आपको साइको-थ्रिलर फिल्में में मजा देती हैं तो फोबिया आकर्षक लग सकती है।

वास्तव में ऐसी फिल्मों के लिए मल्टीप्लेक्सों में टिकट दर मसाला फिल्मों से कम रखी जानी चाहिए ताकि दर्शक जोखिम लेने का साहस कर सके। थोड़ा जोखिम लेने के अगर आप इच्छुक हों तो फोबिया को आजमा सकते हैं।
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