निर्माताः विकी राजानी/सुनील लुल्ला
निर्देशकः पवन कृपलानी
सितारेः राधिका आप्टे, सत्यदीप मिश्रा
रेटिंग **1/2
क्या ऐसा हो सकता है कि भविष्य में होने वाली घटना किसी को पहले दिख जाए? कहते हैं कि कभी कभी कुछ लोगों ने यह अनुभव किया है। जिनके साथ ऐसा नहीं हुआ, उनके लिए इस पर विश्वास करना कठिन है। फोबिया को देखते हुए भी आप कुछ ऐसी मुश्किल से गुजरते हैं। कठिनाई तब और बढ़ती है जब फिल्म के टाइटल पर विश्वास कर बैठते हैं।
फोबिया मतलब होता है, डर। फिल्म की नायिका एगोराफोबिया से ग्रस्त है। यह ऐसी मानसिक दशा है जिसमें इंसान को खुली/अनजान जगहों से डर लगता है। व्यक्ति शॉपिंग मॉल और एयरपोर्ट से भी डरता है। दुनिया के कई लेखक, संगीतज्ञ, अभिनेता इस फोबिया के शिकार रहे हैं। हालांकि इस सूची में कोई भारतीय नाम नहीं मिलता। वैसे, फोबिया की नायिका महक (राधिका आप्टे) चित्रकार है।
महक आधी रात को एक पार्टी से लौट रही है और टैक्सी ड्राइवर उससे रेप की कोशिश करता है। महक खुद को बचा तो लेती है मगर एगोराफोबिया की शिकार बन जाती है। इस संकट में बॉयफ्रेंड (सत्यदीप मिश्रा) उसके साथ है। वह महक को तीन कमरों के जिस फ्लैट में रहने ले जाता है, वहां अचानक ऐसी घटनाएं होती हैं जो महक की समस्या और बढ़ा देती है। क्या महक कुछ घटनाओं की कल्पना कर रही है या सचमुच कोई पारलौकिक मामला है?
निर्देशक पवन कृपलानी दर्शक को बांधने की कोशिश करते हैं, परंतु दूसरे हिस्से में एक वक्त के बाद ही उन्हें कामयाबी मिल पाती है। पहले हिस्से में महक की तमाम बातें लंबे दोहराव की तरह लगती हैं। कुछ जगहों पर आप ऊब भी सकते हैं।