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'साहब बीवी गैंगस्टरः' छल कपट भी लगता है मनोरंजक

Fri, 08 Mar 2013 04:53 PM IST
रोहित मिश्र
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'साहब बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्स', 2011 में रिलीज हुई 'साहब बीवी और गैंगस्टर' का सही मायने में सीक्वल है। फिल्म की कहानी ठीक वहीं से शुरू होती है जहां पिछली फिल्म खत्म होती है। जिन दर्शकों ने पुरानी फिल्म नहीं देखी होगी उन्हें फिल्म के कुछ डायलॉग अपरिचित से लग सकते हैं। इस बार साहब व्हील चेयर पर हैं। बीवी उस क्षेत्र की विधायक बन गयी हैं और पहले से कहीं ज्यादा शराब पीने लगी हैं। गैंगस्टर इस बार नया और साहब की तरह खानदानी है।
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पूरी फिल्म इन्हीं तीन पात्रों के सपने और उनके सपनों की रुकावटों की कहानी कहती है। पिछली फिल्म की तरह ही इस फिल्म की खूबसूरती इसके संवाद हैं। फिल्म की कमजोरी यह है कि फिल्म में बहुत-बहुत बड़ी घटनाएं नहीं हैं। फिल्म छोटे-छोटे किस्सो को समेटते हुए अहिस्ता-अहिस्ता क्लाइमेक्स की ओर बढ़ने का प्रयास करती है। इसका 'आहिस्ता' होना कई दर्शकों को खटक सकता है। लेकिन, घटनाओं के रूप में यह फिल्म जहां कमजोर पड़ती है इसके संवाद उस खाली जगह को पाटने आ जाते हैं। किरदारों की आपसी बातचीत रोचक और मनोरंजक है। तो यह फिल्म जितनी फिल्म निर्देशक की है उतनी ही इसके पटकथा लेखक संजय चौहान की भी।

इस फिल्म में इस बार उपकथाएं ज्यादा हो गयी है। उपकथाएं ज्यादा होने से किसी दर्शक को यह फिल्म मनोरंजक लग सकती है तो कुछ को उलझाऊ। जो लोग तिग्मांशु धूलिया की सिनेमा मेकिंग स्टाईल को पसंद करते हैं उन्हें यह फिल्म भी रास आएगी। जो उनके प्रशंसक नहीं भी हैं वह इस फीडबैक के साथ घर लौट सकते हैं कि उन्होंने एक अलग फिल्म देखी।
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साहब वही, गैंगस्टर और दुश्मन नए-नए

पिछली फिल्म में साहब (जिमी शेरगिल) को गोली लग गयी होती है। इस बार वह व्हील चेयर पर हैं। बीवी (माही गिल) क्षेत्र की विधायक हैं और ज्यादातर नशे में ही रहती है। विधायक वाला काम भी साहब ही देख रहे हैं। इस बीच एक और रजवाड़े परिवार के विधायक राजा जी (राज बब्बर) की बेटी रंजना (सोहा अली खान) पर साहब का दिल आ जाता है। साहब अब अपनी दूसरी शादी करना चाहते हैं। राजा जी को मनाने के लिए साहब उनके बेटे को दुबई में एक कांड में फसवा तक देते हैं। शर्त यह कि वह रंजना से उनकी सगाई कर दे तो उनका बेटा छूट जाएगा। साहब से खुन्नस पाल चुके राजा जी, साहब की साख को खत्म करने के लिए अब अपनी बेटी रंजना को ही एक मोहरे की तरह प्रयोग करते हैं। इसके साथ ही उन्हें इंद्रजीत सिंह (इरफान खान) मिलता है।

इन्द्रजीत सिंह के परिवार की पुरानी खुन्नस साहब के परिवार से रही है। वह इस बदले को पूरा करना चाहता है। इंद्रजीत और रंजना एक-दूसरे से प्यार करते हैं। इंद्रजीत सिंह, साहब को खत्म करने के लिए साहब से नाराज चल रहीं उनकी बीवी को ही मोहरा बनाता है। उधर, रंजना अब साहब के घर में रहकर साहब की जासूसी कर रही होती है। यानी सारे किरदार साहब के खिलाफ हैं। एक रात को रंजना, इंद्रजीत को साहब की बीवी के साथ देख लेती है। यहां स्थितियां बदल जाती हैं। अब रंजना पूरी तरह से साहब के साथ है और इंद्रजीत के हर प्लान के बारे में साहब को बता रही है। फिल्म का क्लाइमेक्स इस बात में है कि इंद्रजीत कैसे खुद को मारकर साहब को कैसे अपने खून के इल्जाम में फंसा देता है। और हां, साहब अब व्हील चेयर से उठ गए हैं और अपने पैरो पर चलने लगे हैं।

साहब लाजवाब, तो दुश्मन भी कम नहीं

तिग्मांशु धूलिया की फिल्म में नायक-खलनायक नहीं बल्कि पात्र होते हैं। इस फिल्म के हर पात्र ने अपनी जगह सही अभिनय किया है। यदि बात सबसे बेहतर अभिनय की हो तो साहब की भूमिका में जिमी शेरगिल सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं। ऐसा शायद इसलिए होता है क्योंकि यह पात्र सबसे मजबूत तरीके से लिखा गया है। पूरी फिल्म साहब के इर्द-गिर्द ही घूमती है। फिल्म में साहब को देखकर लगता है कि यह बुरे नहीं हैं बल्कि बुरा होना उनकी जरूरत है। हर अदा से जिमी प्रभावित करते हैं।

फिल्म में इरफान खान ने एक गैंगस्टर की भूमिका निभायी है। यह भूमिका इरफान पर पूरी तरह से फिट नहीं बैठती पर उन्होंने किरदार निभाया खूबसूरती से है। सनकी और शराबी बीवी के रूप में माही गिल भी अच्छी लगी हैं। सोहा अली खान ज्यादातर खामोश रहती है पर कुछ दृश्यों में वह अच्छी और फिल्म की जरूरत लगती हैं। राज बब्बर सहित बाकी छोटे-छोटे किरदार निभाने वाले कलाकार अपनी जगह पर सही और संतुलित लगते हैं।

कहानी उलझी, पर संवादों ने संभाल लिया

एक निर्देशक के रूप में यह तिग्मांशु धूलिया की सबसे बड़ी और उलझी हुई फिल्म है। उनकी फिल्मों की खासियत फिल्म के चरित्रों का मौके के अनुरूप अपनी आस्थाएं और विश्वास को बदलना होता है। इसे तिग्मांशु बहुत ही प्रभावी तरीके से दिखाते हैं। इस फिल्म की प्रीक्वल फिल्म 'साहब बीवी और गैंगस्टर' की खूबसूरती यह थी कि वहां इंतकाम और बदला साफ-साफ दिख रहा था।

इस फिल्म में कई उपकथाएं जोड़ लेने से फिल्म अपनी तेजी और सटीकपन को कहीं-कहीं खो देती है। ज्यादा तेज फिल्में देखने वाले दर्शक इस बात का शिकवा कर सकते हैं कि फिल्म बहुत धीमी है। घटनाएं उतनी नाटकीय भी नहीं हैं जितनी की इस फिल्म के फर्स्ट पार्ट में हैं। वह फिल्म दिल से बनायी गयी थी और इस फिल्म में दिल के साथ सिनेमाई दिमाग भी लगाया गया है। फिल्म जहां पर खत्म होती हैं वह इस बात की पूरी संभावनाएं छोड़ दी गयी हैं कि इस फिल्म का तीसरा पार्ट भी बने।

संगीत फिल्म के मिजाज का

फिल्म में अलग-अलग तरीके के गाने शामिल किए गए हैं। संगीत निर्देशक संदीप चौटा ने फिल्म के मिजाज के अनुरूप ही गाने रजे हैं। जैज सॉन्ग 'इधर गिरे उधर गिरे' बिल्कुल मौके के अनुरूप आया हुआ गाना है। 'जुगनी' गाने को तो हम कई फिल्मों में सुनते आ रहे हैं लेकिन इस फिल्म में उसके अल्फाज उसे अलग बनाते हैं न कि गाने की धुन।

पीयूष मिश्रा द्वारा गाया गया 'छल कपट', गाना 'गुलाल' फिल्म के 'आरंभ है प्रजंड' जैसे होने की कोशिश करता है। 'मीडिया से कह दू' एक मुजरा है जिसमें उतनी उमंग और तेजी नहीं दिखती जितनी की उसमें जरुरत थी। 'कोना-कोना दिल का' भी एक जरूरी गाना है। जरूरत के समय पर गाने आने और ज्यादातर गाने बैकग्राउंड में बजने की वजह से यह फिल्म को रोकते नहीं हैं। शायद इसीलिए यह अच्छे लगते हैं।
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क्यों देखें

एक अलग किस्म के मनोरंजक सिनेमा को देखने के लिए। फिल्मी भेड़चाल से अलग हटकर बन रही फिल्म के लिए भी।

क्यों न देखें

यह फिल्म मेन स्ट्रीम सिनेमा की नहीं लगती। कई बार लगता है कि हम किसी दूसरी दुनिया की फिल्म को देख रह है।
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