जो आदमी महंगाई, पुलिस और बीवी से डरे उसे आप क्या कहेंगे? आम आदमी। अब इतना डरे हुए आदमी के सामने देश का प्रधानमंत्री आ जाए तो उनके बीच कैसी बातचीत होगी। वह भी तब जब लोकतंत्र के जुलूस के दो विपरीत छोर पर रहने इन दोनों के संवाद की भाषा ही बदल चुकी हो।
निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म जेड प्लस की शुरुआत इन्हीं परिस्थितियों में होती है। राजस्थान के दूर-दराज के कस्बे में अचानक हलचल होती है जब पता लगता है कि अपनी लड़खड़ाती बहु-दलीय सरकार को बचाने के लिए प्रधानमंत्री पीपल वाले पीर की दरगाह पर चादर चढ़ाने आ रहे हैं।
दरगाह के चढ़ावे को लेकर भी गांव के एक कुनबे में झगड़ा है और जिस दिन प्रधानमंत्री आ रहे हैं, उस दिन कुनबे के पंचर की दुकान चलाने वाले असलम (आदिल हुसैन) का नंबर खादिम बनने का है। उसे प्रधानमंत्री के साथ कुछ मिनट अकेले बिताने का मौका मिलेगा और वह जो चाहे मांग सकता है। असलम की जिंदगी में मंहगाई, पुलिस और बीवी के अलावा एक डर और है, अपने पड़ोसी शायर हबीब आशिक (मनोज तिवारी) का और वह प्रधानमंत्री को बताता है कि उसे पड़ोसी से खतरा है।
भाषा के फेर में उलझे प्रधानमंत्री समझते हैं कि इस अदने से इंसान को पाकिस्तान से धमकियां मिल रही हैं और वह उसकी जान की खैर के वास्ते तुरंत जेड प्लस सुरक्षा के आदेश दे देते हैं। इसके बाद असलम की जिदंगी में तूफान उठता है, जो आपको हंसाता भी है और इस लोकतांत्रिक व्यवस्था से कई सवाल भी करता है।
ग्लैमर की नकली चमक में हमारे सिनेमा का असली रंग फीका पड़ चुका है। जयपुर के रहने वाले पत्रकार रामकुमार सिंह की कहानी पर बनी यह फिल्म उस रंग को लौटाने की कामयाब कोशिश है। डॉ.चंद्रप्रकाश द्विवेदी पिंजर के कई बरसों बाद सिनेमा लेकर लौटे हैं।
उन्होंने हमेशा सार्थक रचनाओं से रू-ब-रू कराया है और देखने वालों के मन को छुआ है। जेड प्लस के साथ भी वह यही कर रहे हैं। खास बात यह है कि इस बार डॉ.द्विवेदी ने गंभीरता और तथ्यपरकता के बजाय व्यंग्य से अपनी बात को धार दी है।
सत्ता और जनता के रिश्तों पर बीते तीन-चार वर्षों में इधर काफी मंथन हुआ है और इससे निकले सवालों तथा चिंताओं को जेड प्लस खूबसूरती से सामने रखती है। फिल्म किसी एजेंडे को लेकर नहीं बढ़ती, बल्कि बताती है कि अगर सत्ता ईमानदारी तथा पारदर्शिता से काम करे तो आम आदमी बिना किसी आपाधापी के सुकून-सरलता से जीना चाहता है।
असलम थोड़ा भटकता है, परंतु रास्ते पर आ जाता है। उसकी बीवी साफ शब्दों में कहती है कि ईमानदारी की दो रोटी से वह अपने बच्चे को पाल लेगी, परंतु बेईमानी के एक पैसे को हाथ नहीं लगाएगी। वास्तव में यही भारतीय मन और चरित्र है।
फिल्म देख कर यह भी सवाल पैदा हो सकता है कि लोकतंत्र की एक परिभाषा क्या यह संभव है, सरकार करती है और जनता भरती है? ‘इंग्लिश विंगलिश’ में श्रीदेवी के पति के बाद आदिल हुसैन की नई पहचान असलम पंचरवाले की होगी। छोटे पर्दे की ‘जस्सी’ मोना सिंह ने यहां असलम की पत्नी के रूप में छाप छोड़ी है।