जब पुराने दोस्त मिलते हैं तो जश्न होता है। पुरानी यादों की लहरें मन को भिगोती हैं। लेकिन कभी किसी नादानी के कारण मजा बिगड़ भी जाता है। निर्देशक गुरमीत सिंह की फिल्म ‘वार्निंग’ कुछ इसी अंदाज में कही गई कहानी है।
फिल्म 3डी में है। इसे 2डी में भी रिलीज किया गया है। ‘वार्निंग’ इस मामले में अनूठी है कि यह अस्सी फीसदी से ज्यादा समुद्र के बीच में शूट की गई है। चारों ओर पानी... और बीच में खड़ी एक विशाल नाव।
संकट यहीं आता है। कुछ बेहतर वक्त बिताने के लिए इकट्ठा हुए दोस्तों की जान पर बन आती है। कुछ जान से हाथ धो बैठते हैं, कुछ बच जाते हैं। यदि आप इस फिल्म को एक रोमांचक अनुभव के तौर पर देखना चाहें तो अवश्य जा सकते हैं। लेकिन मुश्किल यह है कि यह रोमांच ज्यादा देर तक टिक नहीं पाता।
कहानी पानी में खड़ी नौका की तरह ठहरी रहती है। वह ‘थ्रिल’ नहीं पैदा करती। यहां घटनाओं में रफ्तार नहीं है। चीजें रुकी-रुकी सी चलती हैं। यहां बिकनी में नायिकाएं हैं। खुले बदन नायक हैं। खूबसूरत सिनेमैटोग्राफी है। यह सब किसी चिकने कागज पर छपे कैलेंडर की तरह है।
कहानी चार लाइनों में बयान करने लायक है और पर्दे पर वे दृश्य नदारद हैं जो आपकी सांस रोक दें। अंत में आप यह भी नहीं जान पाते कि आखिर निर्देशक किस बात की ‘वार्निंग’ दे रहा है।
वरुण शर्मा (फुकरे फेम) और मंजरी फडनीस जैसे चेहरे जरूर जाने-पहचाने हैं, लेकिन बाकी लगभग नए हैं। ऐक्टरों को जितना दिया गया, उतना काम उन्होंने किया। निर्देशक के रूप में गुरमीत की यह पहली फिल्म है और इस माध्यम पर उनकी पकड़े सामने आती है।
स्क्रिप्ट बेहतर होती तो नतीजा अच्छा आ सकता था। सिनेमा में संभावनाएं अनंत होती हैं, लेकिन अगर कहानी और लिखे गए दृश्यों में जान न हो तो सारी मेहनत पर पानी फिर जाता है। फिल्म यही ‘वार्निंग’ देती है।