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जानिए कितना मजबूत है 'सोनाली का केबल'?

Fri, 17 Oct 2014 12:13 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई
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यहां मुश्किल कनेक्शन की है। एक तो कहानी के तार ढीले और दूसरे प्रसारण में भी समस्या है। जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती है इसकी बातें धुंधलाने लगती हैं। फिल्म खत्म होते होते लगता है कि पूरा स्क्रीन फेड पड़ गया। क्या हुआ...? कनेक्शन चला गया? निर्देशक ने दर्शकों को यह बताने के इरादे से फिल्म बनाई कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां सिर्फ पैसा बनाने के लिए मैदान में हैं। हर चीज पर उनका ठप्पा है।
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ब्रांड। अगर अंतिम संस्कार कराना है तो उनके एयर कंडीशंड विद्युत शवदाहगृह हैं और बच्चे नहीं चाहते तो उन्हीं के कंडोम भी हाजिर हैं। कस्टमर बनाने के लिए पहले वे आपके सामने घिघियाती हैं और कस्टमर बनाते ही आपको भूल जाती हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की यह व्यवस्था बहुत सारे ग्राहकों को कष्ट देती है। भले ही यह सच है कि कसाई का चूल्हा हीरे से जड़ा हो, इससे बकरे को क्या फर्क पड़ता है! परंतु आज के ग्राहक चमकदमक भी देखते हैं, इसे कैसे भूला जा सकता है।

निर्देशक के रूप में चारुदत्त आचार्य की यह पहली फिल्म है। उन्होंने पूरे देश में फैल चुके केबल जाल के माध्यम से बहुराष्ट्रीय बनाम स्वदेशी की बहस को दिशा देने का प्रयास किया, परंतु नाकाम रहे। सिर्फ ग्राहकी रिश्तों के बल पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मुकाबला सुनने में अच्छा लगता है। आचार्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कोई विकल्प पेश नहीं कर पाते।
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फिल्म की कहानी सोनाली दत्तूराम तांडेल (रेहा चक्रवर्ती) की है, जो मुंबई के एक इलाके में अपनी दुकाननुमा कंपनी ‘सोनाली केबल’ चलाती है। इसमें भी साठ फीसदी पैसा स्थानीय विधायक का लगा है। विधायक का बेटा (अली फजल) अमेरिका से पढ़ कर लौटा है। सोनाली उस पर बचपन से फिदा है। इधर प्यार दोतरफा होता है और उधर एक मल्टीनेशनल केबल कंपनी, शाइनिंग मैदान में आ जाती है । अब शुरु होता है सोनाली का अपनी केबल कंपनी को बचाने का संघर्ष।

शाइनिंग के मालिक के रूप में अनुपम खेर का किरदार शानदार है और उन्होंने इसे पूरी क्रूरता से जीया है। कैसे चमकती हुई मल्टीनेशनल कंपनियों के मालिकों के दिल काले होते हैं यह अनुपम के रोल में देखा जा सकता है। कैसे आज कंपनियां अपने कर्मचारियों को निष्ठुर होने के सबक सिखाती हैं, वह शाइनिंग के दफ्तर में नजर आता है।

फिल्म की मुश्किल यह है कि दोनों मुख्य किरदारों में सीधा कनेक्ट नहीं दिखाते हैं। लेकिन अंत में अचानक सोनाली कूदती-फांदती बहुमंजिला इमारत के उस आलीशान कमरे में जा पहुंचती है और भाषण देती है, जहां कंपनी का मालिक बैठा है। एकाएक स्टिंग ऑपरेशन कहानी में आता है और फिल्म एक झटके से खत्म हो जाती है।

रेहा सुंदर हैं। उन्होंने काम भी अच्छा किया है। लेकिन सफलता के लिए उन्हें अगली फिल्म तक इंतजार करना होगा। अली फजल ने भी अपनी भूमिका को सही ढंग से निभाया है। परंतु कमजोर स्क्रिप्ट दोनों की प्रतिभा से न्याय नहीं कर पाती। दीवाली के इस सीजन में जब सब तैयारियों में लगे हैं, इस फिल्म से जुड़ पाना आपको घाटे का सौदा लगेगा। अतः जिस काम में लगे हैं, लगे रहिए।
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