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यह प्रकाश झा का व्यावसायिक 'सत्याग्रह' है

Fri, 30 Aug 2013 11:54 AM IST
रवि बुले
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ऐसे आड़े वक्त में जबकि जेब में रखे रुपये की कीमत क्रमशः रिस रही है, प्रकाश झा के ‘सत्याग्रह’ से आप थोड़ा दूर रहेंगे तो कुछ खोएंगे नहीं। यह अन्ना हजारे का सत्याग्रह नहीं है। जिसे हमारे गणतंत्र के जन ने तन-मन-धन से सींचा था। यह प्रकाश झा का व्यावसायिक सत्याग्रह है, जिसकी पोल पहले दस मिनट में ही खुल जाती है।
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विचार की आड़ में आपके सामने बाजार परोसा जाता है। पूरी फिल्म में प्रकाश झा चावल, कच्छा-बनियान, न्यूज चैनल, सीमेंट और साइकिल बेचते नजर आते हैं। उत्पादों के ‘इन-फिल्म-प्रमोशन’ का फूहड़ रूप यहां मौजूद है। यह प्रायोजित सत्याग्रह है। प्रकाश झा का तर्क है कि लालच नहीं करेंगे तो तरक्की कैसे करेंगे? ब्रांड नहीं दिखाएंगे तो फिल्में कैसे बनेंगी? अगर यही सच है तो फिर डेविड धवन, अनुभव कश्यप और रोहित शेट्टी का सिनेमा क्या बुरा है।

गोविंद निहलानी, श्याम बेनेगल और प्रकाश झा की जरूरत क्या है?दिल्ली से प्रेरित होकर प्र्रकाश झा अंबिकापुर में अपनी फिल्म का कैनवास रचते हैं। सच भी है। जरूरी नहीं कि दिल्ली में क्रांति हो तभी खबर बने। जब एक स्कूल के पूर्व प्रिंसिपल दादू (अमिताभ बच्चन) जिले के कलेक्टर को थप्पड़ रसीद कर याद दिलाते हैं कि वह जनता का नौकर है तो क्रांति का बीज पड़ता है।
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दादू कलेक्टर के पास इंजीनियर बेटे की एक दुर्घटना में मौत के बदले में सरकार द्वारा घोषित 25 लाख रुपये का मुआवजा चैक लेने के लिए दो महीने से चक्कर काट रही विधवा बहू (अमृता राव) की बेबसी से उबलते हैं। इस चैक से वे स्कूल खोलेंगे। बेटे का सपना पूरा करेंगे।

लेकिन थप्पड़ की सजा के रूप में उन्हें मिलती है जेल। इस मूल कथा में दादू के बेटे का इंडस्ट्रीयलिस्ट दोस्त (अजय देवगन), स्थानीय युवा नेता (अर्जुन रामपाल) और एक टीवी पत्रकार (करीना कपूर) आकर जुड़ती है। ये मिल कर दादू को जेल से छुड़ाने के लिए जनता का आह्वान करते हैं।

यहां स्थानीय मंत्रीजी (मनोज वाजपेयी) काइयां विलेन के रूप में सामने आते हैं और कहानी आगे बढ़ जाती है। जिसका कोरस है... तंग आ चुके हैं इस सरकार से।
प्रकाश झा कहानी को कई तरह से छौंकते हैं। राजनीतिक टिप्पणियों से। गुस्साई जनता के नारों से। इंजीनियर की मौत के षड्यंत्र से। सरकारी कामकाज की ढील-पोल से। गांधी चौक की प्रतीकात्मकता से।

कबीर के दोहों से। इन सबके बीच वे एक चुंबन का तड़का भी दे देते हैं। इमोशन-एक्शन और ड्रामा से वे पूरे अंबिकापुर को सराबोर कर देते हैं। लेकिन इन तमाम कोशिशों के बावजूद दिल्ली प्रकाश झा से दूर रह जाती है।दरअसल ‘सत्याग्रह’ अन्ना के आंदोलन के टीवी पर दिखाए दृश्यों और आंदोलन में पर्दे के पीछे हुई राजनीतिक घटनाओं का एक शोधपरक कोलाज बन कर रह गई है। ऐसा लगता है कि निर्देशक कोई कहानी नहीं कह रहा, बल्कि उस पर ‘सत्य’ को दिखाने का कोई दबाव काम कर रहा है।

संभवतः यह कोई और नहीं, बाजार का दबाव है। जिसमें वह एक जनांदोलन को जल्दी से जल्दी से पर्दे पर उतार कर बॉक्स ऑफिस को भुना लेना चाहता है।अमिताभ हमेशा की तरह शानदार हैं। मनोज वाजपेयी अपने किरदार में असरकारी हैं। अजय देवगन आंखों से बात करते हैं।

अर्जुन रामपाल की भूमिका ऐसी नहीं है कि उनके कैरियर में कुछ जोड़े। करीना कपूर ने इस फिल्म के साथ अपने नाम में ‘खान’ जोड़ लिया है। यानी ट्रिपल के। बाकी सब ठीक-ठाक है। प्रसून जोशी के गाने कहानी की कुछ लाज बचा लेते हैं और उसकी भावनाओं को सटीक बयान करते हैं।
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