एक सच्चा कलाकार समाज में क्या फर्क लाता है? निर्देशक केतन मेहता की रंग रसिया में आप कुछ पाएं या न पाएं, इस सवाल का जवाब जरूर पाएंगे। भारतीय चित्रकला के इतिहास में ऊंचा मुकाम रखने वाले पेंटर राजा रवि वर्मा के जीवन को यह फिल्म पर्दे पर उतारती है।
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ऐतिहासिक सिनेमा सत्य, कथानक और फंतासियों का मिला-जुला रूप होता है और वह आपको यहां दिखाई पड़ता है। राजा रवि वर्मा के बचपन से उनके कला तथा लोकप्रियता के शिखर को छूने की दास्तान आप यहां देख सकते हैं। साथ ही उनके जीवन की त्रासदियां भी यहां नजर आएंगी।
यह कहानी राजा रवि वर्मा के साथ उनकी प्रेरणा सुगंधा की भी है। इस मराठी बाला को ही राजा रवि वर्मा ने कैनवास पर देवी के रूप में उतारा और उसके न्यूड भी बनाए। ऐसे में धर्म और संस्कृति के झंडे उठाने वालों ने जब उन पर मुकदमा ठोका तो क्या हुआ...?
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त्रावनकोर से मुंबई तक
निर्देशक ने फिल्म की शुरुआत किसी डॉक्युमेंट्री के अंदाज में है क्योंकि जरूरी नहीं कि हर दर्शक को राजा रवि वर्मा के बारे में पता हो। निर्देशक ने बताया कि केरल में पैदा हुआ यह कलाकार कैसे बचपन से चित्रकला में डूबा था और कैसे वहां के राजा ने उसकी प्रतिभा का सम्मान किया।
राजा ने रवि वर्मा को राजा की उपाधि दी। राजकुमारी से उसका ब्याह कराया। मगर राजा की मृत्यु के बाद जब उसका भाई गद्दी पर बैठा तो रवि वर्मा के लिए राज्य में जगह नहीं रह गई क्योंकि जैसे एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं, वैसे ही एक राज्य में दो राजा कैसे रह सकते हैं?
राजा रवि वर्मा की राजकुमारी पत्नी को भी पसंद नहीं आया कि उसका पति चित्र बनाने का काम करता है और अछूत स्त्री को तक सज-धज के साथ कैनवास पर उतारता है। यहीं से रवि वर्मा की मुंबई के लिए यात्रा शुरू होती है और उनका जीवन बदलता है। मुंबई में राजा रवि वर्मा की मुलाकात होती है सुगंधा से, जो एक देवदासी है। सुगंधा राजा रवि वर्मा के चित्रों की प्रेरणा बनती है।
भारत की आत्मा की खोज
राजा रवि वर्मा के जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव तब आता है जब बड़ौदा के महाराज उन्हें बुला कर अपने महल के लिए पेंटिंग बनाने के लिए कहते हैं। वह कहते हैं कि राजा रवि वर्मा को यूरोप जाकर वहां की पेंटिंग्स देखनी चाहिए। वैसी पेंटिंग्स बनानी चाहिए, मगर राजा रवि वर्मा का तर्क है कि वह भारत में रह कर पौराणिक कहानियों को कैनवास पर उतारना चाहते हैं और इसके लिए देश भ्रमण जरूरी है।
देश भ्रमण के दौरान राजा रवि वर्मा अजंता-एलोरा, खजुराहो और कोणार्क के मंदिर में भी जाते हैं और एक नया संसार उनके सामने खुलता है। सुगंधा को देवियों के रूप में कैनवास पर उतारने के बाद वह उसे न्यूड भी पेंट करते हैं। जब प्रिंटिंग प्रेस के साथ यह तस्वीरें समाज में आती हैं तो समाज में खलबली मच जाती है।
एक ही महिला की देवी के रूप में तस्वीरें और उसकी न्यूड भी! धर्म के ठेकेदारों का तर्क है कि इस व्यक्ति ने देवताओं को टके-टके में बिकने वाली चीज बना दिया है। परंतु अदालत में राजा रवि वर्मा अपना मुकदमा खुद लड़ते और जीतते हैं। मगर सुगंधा का क्या होता है...?
अच्छा अभिनय, सेट डिजाइन और संगीत
फिल्म को केतन मेहता ने खूबसूरती से शूट किया है। इसमें टीम वर्क नजर आता है। नितिन देसाई ने खूबसूरत दृश्य रचे और उनमें आकर्षक रंग भरे हैं। जबकि फिल्म में संदेश शाडिल्य का संगीत सुनने लायक है। जहां तक राजा रवि वर्मा के रूप में रणदीप हूडा की बात है तो यहां उनका अभिनय शानदार रहा है।
मुश्किल तब आती है जब निर्देशक उन्हें धीरे-धीरे उम्रदराज होते हुए दिखाते हैं। इसी तरह से सुगंधा के रूप में नंदना सेन सुंदर लगी हैं। न्यूड पेंटिंग्स के लिए उन्होंने जिस खुलेपन से अपने आप को प्रस्तुत किया है वह साहसपूर्ण कदम है। यह बॉलीवुड की आम नायिकाओं के बस की बात नहीं थी।
अदालत में जब सुगंधा को कठघरे में खड़ा करके पूछा जाता है कि राजा रवि वर्मा में उन्हें कौन सी खास बात दिखी जो उसके लिए न्यूड मॉडल गईं? तब सुगंधा का जवाब बताता है कि एक सच्चा कलाकार कैसा होता है? सुगंधा कहती है, ‘इस आदमी ने मुझ जैसी औरत को देवी बना दिया और आपने वेश्या...।’
रंग रसिया के बारे में यह तो नहीं कहा जा सकता कि हर तरह के दर्शक इसे पसंद करेंगे, परंतु यह फिल्म उन लोगों के लिए है जिनके जीवन में किसी भी तरह की कला का प्रमुख स्थान है। फिल्म कला के प्रति प्यार और समर्पण के साथ सेंसरशिप के मुद्दे पर भी एक बहस है।
साथ ही यह भी बताती है कि अपनी लड़ाई में कलाकार चाहे जितना मजबूत हो, परंतु उसकी कला को संरक्षण की जरूरत पड़ती ही है। आज बदले हुए समाज और नई पीढ़ी के नाम पर हमारे सिनेमा में जिस फूहड़ता को बढ़ावा मिल रहा है, उसके बरक्स रंग रसिया जैसे सिनेमा की जरूरत हमें पहले से ज्यादा है।