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राजा नटवरलालः रास आएंगे ठगी के नुस्खे?

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फिल्म देखने में हमेशा ठगे जाने का रिस्क रहता है। अगर आपकी पसंद के हीरो-हीरोइन या निर्देशक न हों तो रिस्क और बढ़ जाता है क्योंकि सिनेमा कई पुर्जों से मिल कर बनता है और एक भी ढीला निकला कि मजा खत्म हो जाता है। माल पसंद आए न आए, बिकने के बाद उसे वापस नहीं किया जा सकता।
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‘राजा नटवरलाल’ की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। अगर आपको ठगी की कहानियां पसंद नहीं हैं, इमरान हाशमी एंटरटेन नहीं करते हैं और कुणाल देशमुख का नामआपने नहीं सुना है तो यह फिल्म भारी लगेगी। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि अगर आप मसाला फिल्में पसंद करते हैं, इमरान के दीवाने हैं और कुणाल की ‘जन्नत’ और ‘जन्नत-2’ देखी है तो यह फिल्म आपको बहुत पसंद आएगी।

हीरोइन फिल्म की कमजोर कड़ी

‘राजा नटवरलाल’ में कहानी तो है, लेकिन तड़का गायब है। हीरोइन फिल्म की कमजोर कड़ी है। इमरान अपनी इमेज के मुताबिक ‘टपोरी’ ठग बने हैं, परंतु परेश रावल जितनी जल्दी ‘गुरू’ से ‘गुड़’ बन जाते हैं, वह फिल्म के ग्राफ को गिरा देता है।

आश्चर्य है कि परेश जैसे ऐक्टर को हीरो के आगे बौना बनाने की जल्दी डायरेक्टर को क्यों पड़ी! अनाथ राजा (इमरान हाशमी) एक छोटा-मोटा अपराधी है, लेकिन बार में नाचने वाली नाजिया (हुमैमा मलिक) के प्यार में पड़ कर बड़ा हाथ मार के जल्दी से ज्यादा पैसा कमाना चाहता है।

राजा को राघव (दीपक तिजोरी) ने सड़क से उठा कर पाला था, जो खुद छोटे-मोटे अपराध करके जिंदगी बसर कर रहा है। दोनों जल्दी अमीर होने के चक्कर में एक ऐसे आदमी वर्द्धा यादव (केके मेनन) के अस्सी लाख रुपये पर हाथ साफ कर देते हैं, जो उनकी जान का दुश्मन बन जाता है। राघव तो मारा जाता है, लेकिन राजा बचने के बाद वर्द्धा से बदला लेना चाहता है। तब वह राघव के ‘गुरू’ योगी (परेश रावल) से मिलता है। राज खुलता है कि योगी तो राघव का भाई है।

फिर बदले की कहानी

राजा और योगी मिल कर रईस केके को सबक सिखाना चाहते हैं, जो साउथ अफ्रीका के केपटाउन में रहता है। इसके बाद कहानी फिल्मी ट्रेक पर दौड़ पड़ती है। फिल्म ‘जन्नत’ (2008) में क्रिकेट की दुनिया की काली हकीकतें दिखाने वाले कुणाल देशमुख ने ‘राजा नटवरलाल’ में भी क्रिकेट के माध्यम से ठगी दिखाई है।

वर्द्धा यादव को राजा और योगी आईपीएल की तर्ज पर एक टूर्नामेंट की ऐसी क्रिकेट टीम बेचने का षड्यंत्र रचते हैं, जिसका अस्तित्व ही नहीं है। यह एक ‘कॉन’ फिल्म है। जिसमें अपराधियों की दुनिया है। यहां ठग हैं, हत्यारे हैं। लेकिन ऐसी फिल्म में जो थ्रिल जरूरी होता है वह यहां गायब है। आप जानते हैं कि आगे क्या होने वाला है। ऐसे में कोई विशेष रोमांच मन में नहीं रहता।
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इमरान के किस तो गायब हैं

फिल्म में न तो इमरान की इमेज लायक ‘किस’ हैं और न ही फ्रंट बैंचर्स को लुभाने वाले सीन। गीत-संगीत भी कर्णप्रिय नहीं है। पाकिस्तान से आई हुमैमा निराश करती हैं। खूबसूरती और ऐक्टिंग दोनों ही लिहाज से। दीपक तिजोरी लंबे समय बाद पर्दे पर दिखे हैं। जबकि परेश की एंट्री से जो रोमांच पैदा होता है, वह निर्देशक ने कुछ ही दृश्यों बाद खत्म कर दिया है।

केके मेनन ने अच्छा काम किया है। इमरान हाशमी इससे पहले ‘एक थी डायन’ और ‘घनचक्कर’ जैसी फ्लॉप दे चुके हैं। यहां भी वह प्रभावित नहीं करते। इन बातों के बावजूद अगर आप इमरान के फैन हैं तो इस फिल्म को कम से कम एक बार तो देख ही सकते हैं। ठगे जाने जैसा नहीं महसूस करेंगे।

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