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Film Review: बोतल बंद पानी जैसा प्यार है 'करीब करीब सिंगल'

Fri, 10 Nov 2017 12:37 PM IST
रवि बुले
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आपका विश्वास इस बात में है कि मिनरल वाटर बॉटल का पानी किसी से शेयर करके पीने से उससे प्यार हो सकता है तो 'करीब करीब सिंगल' देख सकते हैं। यह पूरी तरह उस मैट्रो कल्चर का सिनेमा है जो स्त्री-पुरुष रिश्तों को नए ढंग से परिभाषित करने की कोशिश में है। जहां प्यार वेबसाइटों में तलाशा जाता है और वन नाइट स्टैंड वाले पार्टनर में चमत्कारिक रूप से जीवन साथी भी मिल जाता है। यह रिश्तों के प्रयोग की ऐसी लवस्टोरी है, जिसमें पारंपरिक प्रेम कहीं नहीं है। हीरो-हीरोइन न सात जन्मों के लिए साथ हैं और न साथ जीने-मरने के लिए। 
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सैनिक पति के निधन के बाद करीब एक दशक अकेले गुजार चुकी युवा जया (पार्वती) कभी किसी सहेली की बच्चियों के लिए स्टैपनी आंटी बन जाती है तो कभी किसी सहेली की गैर- मौजूदगी में उसकी बिल्ली का ख्याल रखती है परंतु जीवन में खालीपन अहसास बना है। इसी दौरान स्त्री-पुरुषों को मिलाने वाली एक वेबसाइट के माध्यम से उसका संपर्क योगी (इरफान) से होता है और उनके बीच बात-मुलाकात का सिलसिला चल पड़ता है।

सदा बकबक करने वाला योगी जया से अचानक कहता है कि क्यों न चलकर मेरी तीन एक्स-गर्लफ्रेंड्स से मिला जाए क्योंकि आज भी वे याद में आंसू बहाती होंगी और दोनों अलग-अलग शहरों को चल पड़ते हैं।

इस मोड़ पर रोचक लगने वाला आइडिया फिल्म में दोहराव के सिवा कुछ नहीं लाता। कभी योगी की फ्लाइट छूटती है तो कभी ट्रेन। तय मुकाम के लिए जया और योगी अकेले-अकेले सफर करते हैं। योगी की तीन में से एक भी पूर्व प्रेम कहानी पर्दे पर मुकम्मल नहीं उतरती। फिल्म टूरिज्म दस्तावेज जैसी बन जाती है। ऋषिकेश, जयपुर से लेकर गंगगोट तक। सफर में यही देखना बचा रहता है कि जया-योगी में प्यार पनपेगा या नहीं? फिल्म के ट्रेलर में आकर्षित करता रोमांच यहां गायब है।

यह प्रेम कहानी बहते झरने के पानी जैसी नहीं बल्कि बोतल बंद पानी जैसी है फिल्म उबाऊ होने से बचती है तो इरफान की वजह से। उनका हड़बड़ी और हाजिर जवाबी वाला अभिनय फुलझड़ी की तरह चमकता है। 
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इरफान यहां इतना बड़बड़ाए हैं कि लगता है उन्होंने दो-तीन फिल्मों के डायलॉग एक ही फिल्म में बोल डाले। मलयालम अभिनेत्री पार्वती का काम अच्छा है लेकिन इरफान के मुकाबले वह फीकी हैं। हालांकि उन्हें इरफान के बराबर मौका मिला। फिल्म की एक कमजोरी यह है कि इरफान-पार्वती के बीच सिद्धार्थ मेनन, बृजेंद्रकाला, नेहा धूपिया, ईशा श्रावणी और ल्यूक केनी के लिए मेहमान जैसी भूमिकाएं भी ढंग से नहीं निकली। ये किरदार कहीं असर नहीं छोड़ते।

दुश्मन (1998), संघर्ष (1999) और सुर (2002) जैसी फिल्में देने वाली निर्देशक तनुजा चंद्रा लंबे समय बाद ऐसी फिल्म लाई हैं, जो कहीं-कहीं ठीक लगती है परंतु इसकी अपनी सीमाएं हैं। खास दर्शक वर्ग को ही यह पसंद आ सकती है। फिल्म में न युवा रोमांस है और न वैसा गीत-संगीत। कैमरावर्क जरूर अच्छा है।
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