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फिल्म समीक्षा: इसलिए 'पीकू' देखना जरूरी है...

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क्या कब्ज और दस्त जैसा परेशान-हैरान करने वाला मुद्दा किसी फिल्म का विषय हो सकता है? क्या इससे भी मनोरंजन हो सकता है? अगर आपने निर्देशक शुजित सरकार की पीकू नहीं देखी तो संभवतः विश्वास नहीं कर पाएंगे कि हमारे सारे इमोशन अंततः मोशन से जुड़े हुए हैं!
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बीते वर्षों में बदलते हुए सिनेमा की आहट हमने जिन फिल्मों में सुनी, उनमें पीकू का नाम प्रमुखता से जुड़ जाएगा। यह फिल्म इसलिए भी खास है कि इसमें पिता-पुत्री के रिश्तों की बहुत ही मोहक महक है। आमतौर पर सिनेमा में पिता-पुत्र या मां-पुत्र की कहानियां रची गई हैं। इस लिहाज से भी पीकू को देखना एक सुखकर एहसास है।

ऐसा पिता शर्तिया नहीं देखा होगा आपने

संसार की कुछ मान्यताओं में यह भी शामिल है कि पुत्र विवाह तक माता-पिता का होता है और उसके बाद पत्नी का। परंतु पुत्री आजीवन माता-पिता की होती है। फिल्म इस बात पर मुहर लगाती है। पीकू अपने 70 वर्षीय पिता के कारण विवाह नहीं करती। अगर उसने विवाह किया तो कौन उनकी देखभाल करेगा?

वह कहती है कि बूढ़े होने के बाद माता-पिता अपने आप जीवित नहीं रह सकते, उन्हें जिंदा रखना पड़ता है। वैसे पीकू का विवाह प्रसंग फिल्म में बार-बार उठता है। 70 साल का बूढ़ा पिता भी नहीं चाहता कि वह विवाह करे, परंतु वह आजाद खयाल है और उसे इस पर कोई आपत्ति नहीं कि उसकी बेटी ‘वर्जिन’ नहीं है। वह लोगों को यह बताने से हिचकता भी नहीं है।

कहानी के बारे में कहें तो उसका विस्तार बहुत अधिक नहीं

तीन शादियां कर चुकी पीकू की मौसी भी उससे पूछती है कि उसकी सेक्स लाइफ कैसी चल रही है... और क्यों नहीं वह इसका स्थायी समाधान ढूंढ लेती है यानी विवाह!

पीकू की कहानी के बारे में कहें तो उसका विस्तार बहुत अधिक नहीं है, लेकिन उसकी बारीकियां किसी खूबसूरत दस्तकारी जैसी है। दिल्ली में रहने वाले बुजुर्ग भास्कर बनर्जी (अमिताभ बच्चन) और पीकू (दीपिका पादुकोण) की बातचीत का केंद्र हर दिन सुबह से रात केवल यही रहता है कि आखिर बुजुर्ग महोदय को ‘मोशन’ ठीक से हुआ या नहीं।

फिल्म का पूरा अंदाज कॉमिक है

भास्कर बनर्जी की मुश्किल यह है कि वह मोशन के बारे में बहुत डीटेल्स में बात करते हैं और छोटी-छोटी बातों से खुद को बीमार समझने लगते हैं। इस पर हमेशा पिता-पुत्री में नोंक-झोंक चलती रहती है।

फिल्म का पूरा अंदाज कॉमिक है। छोटे-छोटे आकर्षक दृश्य और चुटीले संवाद यहां हैं। इस कहानी में इरफान एक ट्रेवल कंपनी के मालिक हैं, जिनकी कारें पीकू को रोज दफ्तर लाने-ल जाने के काम में लगी है। जब भास्कर बनर्जी और पीकू दिल्ली से कार द्वारा कोलकाता जाने का फैसला करते हैं, तब इरफान उन्हें ड्राइव करते हैं।
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आपको याददाश्त पर जोर देना होगा, ऐसी आखिरी फिल्म कब आई थी

इसी यात्रा में एक ऐसी लव स्टोरी अंकुरित होती है, जिसमें आप पाते हैं कि सब कुछ आंखों और अदाओं से होता है। दोनों एक-दूसरे को छूते तक नहीं! आपको याददाश्त पर बहुत जोर देना होगा कि ऐसी आखिरी फिल्म कब आई थी, जिसमें हीरो-हीरोइन की प्रेम कहानी एक-दूसरे को छुए बगैर अंजाम तक पहुंची थी।

तीनों कलाकार बेहतरीन हैं और अपने किरदारों के साथ पूरी तरह न्याय करते हैं। विकी डोनर के बाद शुजित सरकार का यह एक और यादगार काम है।

पीकूः मोशन से ही इमोशन
-निर्माताः एमएसएम मोशन पिक्चर्स, सरस्वती एंटरटनमेंट, राइजिंग सन फिल्म्स
-निर्देशकः शुजित सरकार
-सितारेः दीपिका पादुकोण, अमिताभ बच्चन, इरफान
रेटिंग ***1/2

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