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वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई-दोबारा: पुरानी फिल्म ही देख लें दोबारा

Thu, 15 Aug 2013 11:51 AM IST
रवि बुले/मुंबई
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‘प्यार हो गया ना तुझे इससे। न तू इस लड़की को छोड़ सकता है ना मैं। हम दोनों जास्मीन को बहुत चाहते हैं। तू और मैं... और बीच में जास्मीन। हो गई न लड़ाई शुरू...!’
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शोएब (अक्षय कुमार) का यह संवाद कहानी के सारे सिरे खोल देने को काफी है। प्यार के त्रिकोण का यह अंडरवर्ल्ड संस्करण है। एक डॉन। एक उसका वफादार। बीच में एंट्री ऐसी हसीना की जो रावण से भी राम-राम बुलवा दे!

‘वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई’ और ‘डर्टी पिक्चर’ में दर्शकों का एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट करने के बाद मिलन लुथरिया इस फिल्म में बोरियत परोस रहे हैं।
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अंडरवर्ल्ड का डॉन जो दुबई में बैठ कर पूरी मुंबई चलाने का दावा करता है, एक पिद्दी-से रावल (महेश मांजरेकर) को मारने के लिए मुंबई आ जाता है। हर कुछ मिनट में मिलन उसके मुंह से मुंबई पर उसकी मालकियत का बयान दिलाते हैं, जबकि फिल्म में कहीं ऐसा फील ही नहीं होता।

डॉन ने किसी जमाने में एक बच्चे पर जुआ खेला था और पारखी नजरों से ताड़ लिया था कि यह अनवर (इमरान खान) आगे जाकर बड़ा वफादार साबित होगा। अनवर वफादार है भी। लेकिन तभी कश्मीर से कहानी में एक लड़की आ जाती है और सीधे हीरोइन बन जाती है। उसकी पहली फिल्म की शूटिंग भी शुरू हो जाती है।

निर्देशक ने उसे दिमाग से इतना खाली बताया है कि वह ‘इंटरमीडिएट’ और ‘इंटरकोर्स’ में फर्क नहीं जानती। वह शुरुआत में डॉन से प्यार और अनवर से दोस्ती के वादे करते दिखती है। जब डॉन उसके सामने दुनिया की सब सुविधाएं बिछा देता है तो उसे दोस्ती का वास्ता देकर गरीब अनवर के प्यार में डूबने लगती है। ...और शुरू हो जाती है लड़ाई।

यह फिल्म सिर्फ उनका एंटरटेनमेंट करेगी, जो अक्षय कुमार की हर अदा पर ताली मारते हैं। अक्षय के हिस्से में बात-बात पर तुकबंदी जैसे डायलॉग आए हैं। जिन्हें वे पूरी फिल्म में बहुत लाउड होकर बोलते हैं। इसमें संदेह नहीं कि उन्होंने विलेन की एक्टिंग अच्छी की है, लेकिन कमजोर कहानी, ढीले निर्देशन और साथ कदमताल न कर पाने वाले कलाकारों के कारण उनकी मेहनत पर पानी फिर जाता है।

मिलन ने अस्सी के दशक का जो सिने ड्रामा अक्षय को निभाने दिया, उसके मुकाबले बाकी किरदार किसी दूसरे कालखंड के नजर आते हैं। मिलन ने यह भी ध्यान नहीं रखा कि कोई अक्षय का नाम ‘शोएब’ ले रहा है तो कोई ‘शोहेब’! चाहे स्क्रीनप्रेजेंस हो या अभिनय इमरान अक्षय के लिए कोई चुनौती नहीं पेश कर सके। कह सकते हैं कि फिल्म में हीरो है ही नहीं। इससे फिल्म एक तरफ झुक जाती है।

सोनाक्षी ने कुछ दृश्यों में नौसिखिए जैसा अभिनय किया है। अगर कोई गैर स्टारपुत्र-पुत्री ऐसा काम करे, तो उसे पर्दे पर मौका ही न मिले। यह कहने में कोई संकोच नहीं कि ‘वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई’ से इस फिल्म की कोई तुलना नहीं हो सकती क्योंकि अगर झूठ कह दिया तो पब्लिक बुरा मान जाएगी। बेहतर है कि इस फिल्म की जगह उसे ही ‘दोबारा’ देख लें।
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