'नौटंकी साला' एक फ्रेश सी सिचुएशनल कॉमेडी फिल्म है। बिल्कुल नयी और ताजी किस्म की कॉमेडी। यह एक ऐसी फिल्म है जिसके दृश्यों में आप उतरकर उस हास्य को महसूस करते हैं। फिल्म के संवाद जिस चुटीले अंदाज में लिखे गए हैं कलाकारों ने उसी फ्रीक्वेंसी में उन्हें दर्शकों तक डिलेवर किया है।
फिल्म में हर कलाकार अपने करेक्टर में समाया हुआ है। इस नौटंकी का न तो कोई विलेन है और न ही होरो। सभी सिर्फ पात्र हैं। बड़े मजेदार तरीके से चल रही इस फिल्म का थीम एक लव ट्रांगएल है।
फिल्मों का एक अति प्रचलित और घिसा-पिटा ट्रैक होने के बावजूद इस प्रेम त्रिकोण में दर्शकों को "मुझे तुमसे यह उम्मीद नहीं थी", "तुमने मेरा भरोसा तोड़ा है" या "मत कहो मुझे अपना दोस्त"जैसे थके हुए संवाद सुनने को नहीं मिलते। न ही इन दृश्यों को फिल्माते हुए कलाकारों की ढेर सारी ओवरऐक्टिंग।
फिल्म की छोटी-छोटी दो कमियां हैं। पहला उसकी लंबाई और दूसरा उसका क्लाइमेक्स। इन दोनों जगहों पर निर्देशक का कला पक्ष, दर्शकों के मनोरंजन पर हावी होता दिखता है। कुल मिलाकर इस चुटीली कॉमेडी को एक बार जरूर देखा जाना चाहिए।
कहानी एक, नौटंकियां अनेक
फिल्म की कहानी आरपी (आयुष्मान खुराना) से शुरू होती है। वह एक थिएटर कंपनी का निर्देशक और एक्टर है। एक रात 'रावणलीला' नाम का प्ले करके जब वह घर वापस आ रहा होता है तो उसे रास्ते में एक आदमी सड़क पर अपने सूटकेस पर खड़े होकर पेड़ से फांसी लगाता हुआ दिखता है। यह मंदर (कुणाल राय कपूर) होता है। वह अपनी जिंदगी से नंदनी (पूजा साल्वी) के जाने से पूरी तरह से टूट चुका होता है।
आरपी उसे घर लाता है। घर पर रखने के साथ वह उसे अपने थिएटर में राम का किरदार भी दे देता है। वह मंदर की जिंदगी में नंदनी को वापस लाना चाहता है। इसके लिए वह नंदनी से कई बार मिलता है। इस बीच आरपी और नंदिनी को एक-दूसरे से प्यार हो जाता है।
फिल्म का क्लाइमेक्स इस बात में है कि नंदनी आखिरी मिलती किसे है। इस लव ट्राएंगल के साथ आरपी और मंदर की अपनी-अपनी एक कहानी भी चल रही होती है। जाहिर है वह कहानी ज्यादा दिलचस्प और मजेदार है।
कमाल के लगे आयुष्मान और कुणाल
अपनी दूसरी ही फिल्म से आयुष्मान खुराना ने दिखाया है कि वह कितने बड़े नेचुरल एक्टर हैं। 'विक्की डोनर' के बाद आयुष्मान ने एक बार फिर कमाल की ऐक्टिंग की है। जिन दृश्यों में आयुष्मान को कॉमेडी के साथ इमोशन भी करना था उनमें वह बेहद खूबसूरत दिखे हैं। कुणाल रॉय कपूर इस फिल्म के पहले 'डेल्ही बेली' में बड़ी सी दाढ़ी रखे हुए नीतिन की भूमिका में दिखे थे।
इस फिल्म में मंदर का किरदार उस फिल्म से अलग था। यहां उन्हें एक लापरवाह, बुझे और प्यार में टूटे हुए आदमी का कॉमिक किरदार करना था। कुणाल इस रोल में फिट तो बैठते हैँ लेकिन अच्छे संवाद उनके पास न होने से वह वैसा जादू नहीं जगा पाते। पूजा साल्वी का चेहरा रोमांटिक फिल्मों के लिए बना ही नहीं है। वह टीवी पर आने वाले 'हिटलर दीदी' जैसे धारावाहिकों की दीदी ज्यादा लगती हैं।
निर्देशक ने भरी ऊंची उड़ान
एक निर्देशक के रूप में यह रोहन शिप्पी की ऊंची उड़ान है। इसके पहले उन्होंने 'दम मारो दम', 'ब्लफ मास्टर' और 'कुछ न कहो' जैसी फिल्में निर्देशित की थीं। रोहन की ये पिछली तीनों फिल्में कई हिट हिंदी फिल्मों की कॉकटेल थीं। 'नौटंकी साला' की खूबी उसका बाकी फिल्मों से डिफरेंट होना है। एक सीन देखिए। फिल्म के करेक्टर मंदर की नानी के घर पर "कुत्तों से सावधान रहें" जैसा एक बोर्ड लगा होता है।
उस बोर्ड पर आतंकियों से एक अपील की गयी होती है। उस पर लिखा होता है कि "कृपया यहां बम न फोड़े, मीडिया बाद में बहुत परेशान करता है।" यह एक सीन दिखाता है कि रोहन, दर्शकों को किस अंदाज से हंसाना चाह रहे थे। रोहन शिप्पी की कमी फिल्म की लंबाई, गानों की अधिकता और क्लाइमेक्स को थोड़ा कठिन बनाने में दिखती है। इसे और भी बेहतर किया जा सकता था। पर यह गलती फिल्म को बहुत कमजोर नहीं करती।
गाने खूब हैं, पर हैं मजेदार
फिल्म के गाने मजेदार और सिचुएशन के अनुरूप हैं। गाने कुछ ज्यादा हैं इसलिए वह कहानी तो रोकते हैं लेकिन अच्छे होने की वजह से उतना नहीं अखरते। "साडी गली आ जा", "मेरा मन कहने लगा" और "दिल की तो लग गयी" गाने सुनने के साथ देखने में भी अच्छे लगते हैं।
दो पुराने गानों "सो गया यह जहां" और "धक धक करने लगा" को भी फिल्म में यूज किया गया है। फिल्म का संगीत अच्छा है। फिल्म से इतर एक म्यूजिक एलबम के रूप में भी 'नौटंकी साला' याद की जाएगी। अभिनय करने के साथ आयुष्मान खुराना ने फिल्म के कुछ गाने भी उतनी ही मोहब्बत और जिंदादिली से गाए हैं।
क्यों देखें
एक मजेदार और अलग किस्म की कॉमेडी देखने के लिए। साथ ही थिएटर के पीछे की नौटंकी के लिए भी।
क्यों न देखें
यदि आप चुलबुल पांडेय जोन में ही रहना चाहते हों।