कोई फिल्म क्यों बनती है और अगर बन गई तो क्यों देखी जाए? दोनों सवाल नमस्ते इंग्लैंड देखते हुए उठते हैं। विपुल शाह सीनियर प्रोड्यूसर-डायरेक्टर हैं लेकिन समय के साथ ताल मिलाने की उनकी यह कोशिश बहुत कमजोर है। वह 1990 के दशक और 2018 को मिलाकर जो बनाते हैं, वह हास्यास्पद है। एक तरफ इंटरनेशल ज्वैलरी डिजाइनर बनने की महत्वाकांक्षा पाले जसमीत (परिणीति चोपड़ा) का बूढ़ा दादा है, जो पोती की शादी के लिए उसके प्रेमी परम (अर्जुन कपूर) के परिवार वालों के आगे शर्त रखता है कि बहू को घर से निकल कर बाहर काम नहीं करने देंगे। दूसरी तरफ जसमीत शादी के बाद इंग्लैंड जाने के लिए वहां रहने वाले एक बंदे के साथ नकली शादी तक कर लेती है। उसका तर्क है इंग्लैंड की नागरिकता मिल जाने पर परम को भी वहां बुला लेगी। क्रोधित परम पीछे-पीछे गैर-कानूनी रास्ते से इंग्लैंड जाता है और वहां आलीषा (अलंकृता सहाय) की मदद से जसमीत को असली प्यार का एहसास दिलाता है। प्यार अंततः इंसान से होता है। करिअर या देश से नहीं।
फिल्म पूरी तरह अविश्वनीयस घटनाक्रमों से बुनी गई और यह नहीं सोचा गया कि दर्शक को पास दिमाग भी होता है। तर्क कोई चीज होती है। महिलाओं का घर से निकल कर काम करने का मुद्दा अब छोटे शहरों-कस्बों में भी उतना बड़ा नहीं है, जितना जसमीत के दादाजी के दिमाग में दिखाया गया। लेकिन उसके आगे जो ड्रामा विपुल शाह और उनके राइटरों की टीम ने रचा, वह सवाल पैदा करता है कि आखिर उन्होंने यह फिल्म क्यों बनाई? यह अक्षय कुमार-कैटरीना कैफ की नमस्ते लंदन का सीक्वल नहीं है और नमस्ते इंग्लैंड कहने भर से इसमें पुरानी रंगत नहीं आ जाती है।
फिल्म विपुल शाह का पुराना पड़ जाना तो बताती है लेकिन इससे भी ज्यादा यह अर्जुन कपूर और परिणीति चोपड़ा के करिअर के लिए खतरे की घंटी है। उनका फिल्म का चयन तो खराब है ही, अभिनय उससे भी ज्यादा दयनीय है। हालांकि इसके लिए वह कहानी और निर्देशन को दोष दे सकते हैं। यहां उनके प्यार की कहानी दशहरे, दीवाली से होली तक का सफर तय करती है। इस प्यार की गहराई का हाल यह है कि जसमीत के गले लगने पर हर बार परम के मन में गंदी बातें आती है।
वह यह बात बार-बार कहता भी है। वीजा पर बेतुकी बातें हैं। विपुल ने कहानी से ज्यादा दृश्य रचे हैं। ऐसा लगता है कि वह मानते रहे कि कथित भव्यता ही किसी फिल्म को देखे जाने योग्य बना देती है। फिल्म के गाने शुरू होते ही लगते हैं कि कब खत्म होंगे। नमस्ते इंग्लैंड में न तो इंग्लैंड जमता है और न पंजाब। नया यहां कुछ नहीं है। सारा कुछ घिसा-पिटा है। किसी को दूर से नमस्कार करना भले ही मुहावरेदार भाषा में कही बात हो परंतु नमस्ते इंग्लैंड के बारे में आप इसे दो टूक समझ सकते है।