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आपको निराश नहीं करेगी रानी की मर्दानगी

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मर्द पुलिसवाले आपने पर्दे पर बहुत देखे हैं, अब देखिए मर्दानी। मुंबई में क्राइम ब्रांच की सीनियर इंस्पेक्टर शिवानी शिवाजी रॉय। रानी मुखर्जी लंबे समय बाद आई हैं और फिल्म सीधे तौर पर उन्हें की बाजार में फिर स्थापित करने के लिए बनाई गई है। ऐसे में आप रानी के फैन हैं तो ‘मर्दानी’ जरूर देखें।
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फिल्म में बच्चों, खास तौर पर लड़कियों की तस्करी के मामले को केंद्र में रखा गया है। फिल्म ‘हार्ट हिटिंग’ है। लेकिन सच्चाई के नजदीक दिखने की कोशिश में इसका ज्यादा जोर ‘च’ अक्षर वाले शब्द को बार-बार दोहराने और रानी को ऐक्शन हीरोइन के रूप में स्थापित करने का है।

यही कारण है कि पहली बार चोपड़ा कैंप सेंसर बोर्ड से यू या फिर यू/ए प्रमाण पत्र हासिल नहीं कर सका। यह एडल्ट फिल्म है और 18 वर्ष से कम आयु वालों के लिए कतई नहीं है। अगर आप परिवार के साथ फिल्म देखने की योजना बना रहे हैं तो इरादा बदल दें।
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कई दृश्य चौंकाते हैं

इन दिनों जब निर्देशक एडल्ट कंटेंट का सिनेमा बनाते हैं तो उनका आग्रह उसे ज्यादा से ज्यादा खुल कर दिखाने का होता है। कुछ महीने पहले निर्देशक नागेश कुकनूर ने लड़कियों की तस्करी के विषय वाली फिल्म ‘लक्ष्मी’ में यही किया था। अब प्रदीप सरकार भी इसी दिशा में आगे बढ़े हैं।

उन्होंने फिल्म में वेश्यावृत्ति के पेशे में उतारी जाने वाले लड़कियों के ऐसे सीन दिखाए हैं जो चौंकाते हैं। सवाल उठता है कि क्या निर्देशक का ध्यान फिल्म के माध्यम से कोई ठोस संदेश देने से ज्यादा ऐसे दृश्य दिखा कर बॉक्स ऑफिस पर हिट होना है?

नागेश बहुत बोल्ड फिल्म बनाने के बावजूद बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप थे। प्रदीप सरकार की फिल्म पर पकड़ जरूर है, लेकिन कहानी में कुछ सिरे ढीले छूट जाते हैं। फिल्म में ‘चूहों को घर में पनाह देने से प्लेग फैलता है’ जैसे संवाद निराश करते हैं।

रानी के लिए एक्‍शन के मौके

फिल्म शिवानी रॉय की कहानी है। जो डॉक्टर पति के साथ रहती है। दोनों के साथ उनकी दस-बारह साल की भांजी भी रहती है। जिसकी दोस्त है ट्रेफिक सिग्नल पर फूल बेचने वाली हमउम्र प्यारी। शिवानी उसे भी बेटी की तरह मानती है।

एक दिन प्यारी गायब हो जाती है। शिवानी प्यारी तलाश में है। उसे पता चलता है कि लड़कियों को उठा लेने वाला एक गैंग मुंबई से दिल्ली तक सक्रिय है। वह गैंग के सफाए में लग जाती है। इस बीच शिवानी और गैंग लीडर करन रस्तोगी (ताहिर भसीन) के बीच चूहे-बिल्ली की दौड़ चलती है। अंत में जीत किसकी होती है यह कहने की जरूरत नहीं।
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पूरा हो जाता है मिशन

रानी मुखर्जी ने अच्छा अभिनय किया है और पूरी फिल्म को अपने कंधों पर लेकर चली हैं। जबकि ताहिर भसीन अपने रोल में खरे उतरे हैं। फिल्म ‘मिस लवली’ में दर्शकों के दिमाग पर छा जाने वाले अनिल जॉर्ज ताहिर के पिता के रूप में फिर प्रभाव छोड़ते हैं। फिल्म को खूबसूरती से शूट किया गया है।

तेज रफ्तार और कसी हुई इस फिल्म में गीत-संगीत की जगह नहीं थी। निर्देशक ने इस बात से न्याय किया। अंत में जब मर्दानी अपना मिशन पूरा करके निकलती है तभी उसकी तारीफ में एक गीत बजता है। एक बार इस फिल्म को देखा जा सकता है। अगर यह आपको बहुत अच्छी नहीं लगेगी, तब भी निराश नहीं करेगी।
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