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भारत-पाक रिश्तों पर बेहद संवदेशनील फिल्म

Fri, 02 May 2014 08:30 AM IST
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई
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क्या दिल्ली क्या लाहौर भारत और पाकिस्तान के रिश्तों पर बनाई गई एक बेहद संवदेनशील फिल्म है। गुलजार और विजय राज ने कमाल किया है।
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लकीरें हैं तो रहने दो/किसी ने रूठ कर गुस्से में शायद खींच दी थीं/इन्हीं को अब बनाओ पाला/और आओ कबड्डी खेलते हैं/लकीरें हैं तो रहने दो... गीतकार गुलजार की इन पंक्तियों के साथ शुरू होने वाली ‘क्या दिल्ली क्या लाहौर’ निर्देशक के रूप में विजय राज की पहली फिल्म है।

उन्हें हम एक बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग वाले ऐक्टर के रूप में जानते हैं। लेकिन इस फिल्म को उन्होंने जिस खूबसूरती और संवेदना के साथ बनाया है, ऐसा हिंदी में कम ही देखने को मिलता है। 1947 से लेकर 2014 तक तारीखें भले ही आंकड़ों की तरह शुष्क दिखाई दें, लेकिन सचाई है कि तारीखों से मिले जख्म आसानी से नहीं भरते।
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दीवारों को लेकर इन दिनों टीवी में एक विज्ञापन चल रहा है। दीवारें दो तरह की होती हैं... अच्छी दीवारें और बुरी दीवारें। कुछ दीवारें दिखती हैं... कुछ दीवारें दिखाई नहीं देतीं...। ऐसी ही न दिखने वाली एक दीवार पर विजय राज की यह फिल्म आकार लेती है।

1948 के दिनों में पश्चिमी सीमा पर लड़ते भारत-पाकिस्तान के दो सैनिकों का आमना-सामना होता है और बंदूक की गोलियों के बीच बोलियां भी चलती हैं। बातों-बातों में बुरी दीवारें गिर जाती हैं। लेकिन क्या सचमुच दो लोगों के बीच दीवार गिर जाने से सब कुछ ठीक हो जाता है?

इस कहानी में पाकिस्तानी फौजी रहमत अली (विजय राज) भारतीय चौकी तक एक सीक्रेट फाइल की तलाश में आता है। वह फाइल जिसमें दिल्ली के लाल किले से लेकर लाहौर तक एक सुरंग बनाए जाने की योजना छुपी है। लेकिन रहमत का सामना इस चौकी में एकमात्र जिंदा रह गए बावर्ची समर्थ (मनु ऋषि) से होता है।

रहमत और समर्थ के बीच बंदूकें चलती हैं और वे एक-दूसरे को खरी खोटी भी सुनाते हैं, जिसमें अतीत पन्ना-दर-पन्ना खुलता है और दो देशों के बीच खिंची लकीरों के पीछे हुई सियासत सामने आती है। साथ ही यहां से वहां जाने वालों और वहां से यहां आने वाले रिफ्यूजियों के साथ हुए अन्याय को भी फिल्म सामने लाती है।

फिल्म का अंदाज कॉमिक है, लेकिन भावनाएं प्रधान हैं। हाल के दिनों में ‘वार छोड़ ना यार’ और ‘टोटल स्यापा’ जैसी फिल्मों ने भारत-पाक संबंधों के तनाव को हल्के-फुल्के ढंग से दिखाने और भाईचारे का संदेश की कोशिश की थी, लेकिन विजय राज की फिल्म उनसे कहीं बेहतर, संवेदनशील और कामयाब है।
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फिल्म की रफ्तार शुरुआत में हालांकि धीमी है, मगर बाद में यह दर्शक को बांध लेती है। फिल्म में नाटक का प्रभाव भी देखने को मिलता है। विजय राज और मनु ऋषि का अभिनय शानदार है। दोनों पहले अनेक फिल्मों में अपनी प्रतिभा दिखा चुके हैं। राज जुत्थी की भूमिका छोटी मगर प्रभावशाली है। सिनेमा की संवेदना को समझने वाले दर्शक इस फिल्म का आनंद ले सकेंगे।

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