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फिल्म 'खूबसूरत' है कि नहीं ये आप तय करें

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सिनेमा हकीकत नहीं है, यह सबको पता है। लेकिन निर्देशक की कोशिश इस संसार को ही पर्दे पर साकार करने की होती है। वह जितनी ज्यादा सच्चाई के नजदीक लगने वाली कथा को रचता है, उतना सफल कहता है। फिल्म उतनी बड़ी कहलाती है।
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अगर पर्दे की दुनिया नकली मालूम पड़े तो सिनेमा कैसे सफल कहा जा सकता है? निर्देशक शशांक घोष की फिल्म ‘खूबसूरत’ नकली फिल्म है। हालांकि इसमें ऊपरी चमक-दमक दिखती है और आकर्षक लगती है, लेकिन यह प्लास्टिक के फूलों जैसी है। नकली। जो कई बार असली को भी मात देती नजर आती है। हर दौर में ऐसी फिल्मों की बहुतायत रही है।

हमारे समय में भी है। सच्चाई यह है कि ये फिल्में सिनेमा के संसार को किसी तरह से समृद्ध नहीं करतीं, सुंदर नहीं बनातीं। ये मनोरंजन के संसार का प्रदूषण हैं। प्लास्टिक प्रदूषण के जैसा।
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यह सोनम कपूर का विज्ञापन है

‘खूबसूरत’ के पहले ही दृश्य से साफ हो जाता है कि यह सोमन कपूर की ब्रांडिंग का 130 मिनट का विज्ञापन है। जिसमें न केवल उनकी प्लास्टिक की गुड़िया जैसी छवि को आकर्षक रंगों से संवारने की कोशिश की गई है, बल्कि कहीं-कहीं यह भ्रम पैदा करने का प्रयास भी है कि उन्हें अब ऐक्टिंग करना आ गई है।

जेम्स की गोलियों की जितनी रंग-बिरंगी छवियां होती हैं, निर्देशक ने वह सब पर्दे पर उतारी हैं। एक सैशे में सारा कुछ रंग-बिरंगा पैक किया है। शशांक कहते रहे हैं कि ऋषिकेश मुखर्जी की रेखा स्टारर क्लासिक ‘खूबसूरत’ से प्रेरणा लेकर उन्होंने अपनी फिल्म बनाई है, जबकि फिल्म देख कर आप पाते हैं कि यह सफेद झूठ जैसा है।

कुछ यूं चलती है कहानी

एक आईपीएल टीम की फिजियोथेरेपिस्ट डॉ.मृणालिनी चक्रवर्ती उर्फ मिली (सोनम कपूर) राजस्थान के संभलगढ़ राजघराने में पहुंचती है क्योंकि राजा शेखर सिंह व्हीलचेयर पर हैं। दस साल पहले एक हादसे में बड़े बेटे को खोने के बाद से वह इस हालत में हैं। मिली को उन्हें चलने-फिरने लगाय बनाना है।

राजा की इस हालत के बाद पत्नी राजमाता निर्मला (रत्ना पाठक शाह) ने न केवल युवराज विक्रम सिंह राठौर (फवाद खान) और उसकी बहन दिव्या को पाल-पोस कर बड़ा किया है बल्कि राजवंश का पूरा कारोबार भी संभाला। अतः राजामाता सख्त है। नतीजा यह कि दस साल से राजमहल में कोई हंसा तक नहीं।

मिली जब वहां पहुंचती है तो अपने हंसमुख, चंचल, बिंदास स्वभाव से हालात को बदलने लगती है। सबको अहसास होता है कि वे सांस तो ले रहे हैं, मगर जी नहीं रहे। परिवर्तन के इस ड्रामे में राजमाता से मिली का टकराव और युवराज से प्रेम शामिल है।
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क्या गाने लुभाएंगे?

यह कहानी फिल्म के पहले में जहां लचर और ठहरी-सी है, वहीं दूसरे हिस्से में थोड़ा ड्रामा पैदा करने की कोशिश की गई है। जो मनोरंजन के लिए नाकाफी है। कोई कलाकार भी प्रभाव नहीं छोड़ता। सोनम की ऐक्टिंग के बारे में कुछ कहना बेकार है। अपनी कमजोर फिल्मों का ठीकरा हर बार वह दूसरों के सिर फोड़ती हैं।

पाकिस्तान के फवाद खान को लेकर निर्माताओं ने अपनी फिल्म में क्या खास चमक पैदा की वही बता सकते हैं। रत्ना पाठक शाह का रंग-रूप और ऐक्टिंग देखकर उनके सुपरहिट सीरियल ‘साराभाई वर्सेज साराभाई’ की याद आती है।

मिली की मां के रूप में किरण खेर हैं और हमेशा की तरह पंजाबी महिला की भूमिका में बहुत ही लाउड हैं। मां-बेटी का ट्रेक अलग से गढ़ा हुआ और बेमजा है। फिल्म में गानों की कहीं जगह नहीं थी, उन्हें ठूंसा गया है। कॉमेडी और रोमांस के नाम पर शशांक घोष ने जो कुछ बनाया है उसे आप चाहे जो नाम दें, ‘खूबसूरत’ तो कतई नहीं कह सकते।
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