जयंताभाई की लव स्टोरी में कोई दृश्य ऐसा नहीं है जिसे दर्शक किसी न किसी फिल्म में पहले देख न चुके हैं। फिल्म दरअसल कहीं की ईट और कहीं का रोड़ा इकट्ठा करके इमारत खड़ी करने की बेहद असफल कवायद है। फिल्म के निर्देशक विनील मरकन हैं। यह उनकी पहली फिल्म है। फिल्म बनाते वक्त उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि यह उनकी पहली फिल्म है, दर्शकों की नहीं। विवेक ओबेराय का यह फिल्म चुनना समझ से परे है।
फिल्म में दो ट्रैक चल रहे होते हैं। एक जयंताभाई की लव स्टोरी का और दूसरा उसकी भाईगीरी का। इन दोनों ही कहानियों को बड़े ही बचकाने तरीके से फिल्माया गया है। चूंकि दर्शक अंडरवर्ल्ड की कहानियों को बड़े ही मौलिक और प्रभावी तरीके से देख चुके हैं इसलिए उन्हें इस फिल्म के 'भाई' बड़े ही सतही नजर आते हैं। रहा सवाल प्रेम कहानी का तो यह शुरू से अंत तक ओवरऐक्टिंग का प्रदर्शन जैसी लगती है।
कहानीः
फिल्म की कहानी सिमरन (नेहा शर्मा) और जयंताभाई (विवेक ओबराय) की है। सिमरन मुंबई में नौकरी करने के लिए आती है। (आमतौर पर लोग मुंबई हीरो-हीरोइन बनने के लिए जाते हैं) उसे नौकरी करते हुए दो महीने ही हुए होते हैं कि उसकी नौकरी छिन जाती है। कंपनी से मिला घर खाली करने के बाद वह एक सस्ते घर में रहने के लिए आती है। अंडरवर्ल्ड के छोटे-मोटे कामों में लगा जयंता, सिमरन का पडोसी होता है। धीमे-धीमे जयंता और सिमरन करीब आते जाते हैं। सिमरन को कई इंटरव्यू के बाद भी नौकरी नहीं मिलती है। इस बीच इन दोनों के बीच प्यार हो जाता है। सिमरन, जयंता को अपने घर ले जाकर उसे अपना ब्वॉयफ्रेंड भी बताती है। जयंता की असलियत खुल जाने पर वह थोड़े समय-समय के लिए अलग हो जाते हैं। बाद में स्वाभाविक तरीके से दोनों एक-दूसरे के प्यार को स्वीकार कर लेते हैं। इस कहानी के साथ एक अडंरवर्ल्ड की भी एक बोरिंग कहानी चला करती है।
अभिनय
विवेक ओबेराय के साथ समस्या है कि वह एक कदम आगे बढ़ते हैं तो दो कदम पीछे हो जाते हैं। विवेक प्रतिभाशाली कलाकार हैं पर उनका ऐक्टिंग कॅरियर जब-तब खराब फिल्में चुनने की वजह से तबाह होता रहा है। कुछ सालों से पहले कई फ्लाप फिल्म देने के बाद 'रक्त चरित्र' फिल्म से उनका कॅरियर पटरी पर आया था। विवेक अब फिर से वही गलतियां दोहरा रहे हैं। 'किस्मत लव पैसा दिल्ली' के बाद 'जयंताभाई की लव स्टोरी' लगातार दूसरी ऐसी फिल्म है जिसे चुनकर विवेक ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है।
शायद सोलो हीरो के मोह में विवेक ऐसी फिल्में चुन लेते हैं। फिल्म को अकेले दम पर खींचना विवेक ओबेराय के बूते की बात नहीं है। यह बात उन्हें खुद के साथ फिल्मकारों को भी समझ आ जानी चाहिए। विवेक इस फिल्म में बेहद बचकाने दिखे हैं। नेहा शर्मा के पास इस फिल्म में ऐक्टिंग करने के पर्याप्त मौके थे। पर वह इस फिल्म के किरदार में घुसने की कोशिश ही नहीं करतीं। उनका चेहरा खूबसूरत हैं, आंखे अच्छी हैं वह मेहनत करें तो बेहतर अभिनेत्री बन सकती हैं। जाकिर हुसैन के पास जो थोड़ा सा रोल था उसे उन्होंने निभा दिया है।
निर्देशन
फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी निर्देशन हैं। फिल्म का एक-एक दृश्य सतही निर्देशन की कहानी कहता है। अंडरवर्ल्ड के अलग-अलग पहलुओं पर कई तरह की प्रभावी फिल्म बन चुकी हैं। उन फिल्मों को देख चुके दर्शक को यह फिल्म इतनी लाऊड और अधकचरी लगेगी कि उसे इस फिल्म के कई सारे डॉनों को एक मिनट भी झेलना मुश्किल लगेगा। डॉन से 'अपुन', 'आइला', 'तेरे को', 'टपका देगा' 'खल्लास कर देगा' जैसे शब्द बुलवाकर निर्देशक खुश हो लेता है कि देखा हमने अडंरवर्ल्ड की दुनिया दिखा दी। यही अधकचरापन प्रेम कहानी का भी रहा है। फिल्म की स्क्रिप्ट में कहीं-कहीं कुछ नया करने की गुंजाइश थी लेकिन वहां भी निर्देशक ने उन्हीं दृश्यों का सहारा लिया है जो वह पहले किसी फिल्म में देख चुके होते हैं। फिल्म का स्क्रीनप्ले भी बेहद कमजोर हैं।
संगीत
गनीमत है कि फिल्म में गाने कम हैं वरना दर्शकों को उन्हें भी झेलना एक त्रासदी से गुजरना जैसे लगता। फिल्म में तीन गाने हैं जो फिल्म की तरह की कमजोर और घिसे-पिटे हैं।
क्यों देखें
यदि आप विवेक ओबेराय की हर फिल्म को देखने का रिकॉड बना रहे हों।
क्यों न देखें
फिल्म के बारे में इतना बताने के बाद भी कहने के लिए कुछ बचता है क्या।