फगली फिल्म किस तरह से 'अगली' फिल्म है। इस फिल्म से कई सारे दिलचस्प कहानियां भी अजीब हैं।
सबसे पहले यह तय किया जाए कि ये फगली फगली क्या है? फिल्म शुरू होने से पहले निर्देशक पर्दे पर स्पष्ट करता है, फगली मतलब ‘फाइट अगेंस्ट अगली’। अंग्रेजी शब्दकोशों में ‘अगली’ माने होता है कुरूप या घृणित।
कुछ ही पल में समझ जाते हैं कि निर्देशक आपको समाज और राजनीति का कुरूप या घृणित चेहरा दिखाने जा रहा है, जिससे फिल्म के नायक-नायिकाएं संघर्ष करेंगे। लेकिन किस तरह? फिल्म के लिए रोचक कहानी चाहिए। कल्पनाशील और कसावट भरा निर्देशन चाहिए। साथ ही एंटरटेनमेंट भी।
‘फगली’ की कहानी ऐसा नयापन नहीं है कि वह रोचक लगे। इसकी मेकिंग पर राकेश ओमप्रकाश मेहरा की ‘रंग दे बसंती’ (2006) की छाप है और कहानी पर बिजॉय नांबियार की ‘शैतान’ (2011) की। निर्देशक ने कई हिस्सों को कसने की जरूरत नहीं समझी, जिससे कहानी में झोल पैदा हो गए हैं।
कल्पनाशीलता तो बात छोड़ ही दीजिए। अतः एंटरटेनमेंट का लेवल आप खुद समझ सकते हैं।‘फगली’ में चार युवा दोस्त हैं। उनके पास सपने हैं। लेकिन समाज और राजनीति की कुछ ऐसी ‘अगली’ बातें हैं, जिससे हीरोइन को लगता है कि इस देश में ऐसी कोई बात नहीं, जो इस पर मर मिटा जाए।
इस समाज में लड़कियों को दोयम दर्जे का समझा जाता है और सेक्स के भूखे भेड़िये सदा उनके शिकार की ताक में रहते हैं। हालांकि लड़की जिन लड़कों के ग्रुप में है वे सभी शरीफ हैं। वे लड़की से बदतमीजी करने वाले एक किराना दुकानदार को सबक सिखाना चाहते हैं और मुश्किल में पड़ जाते हैं। एक भ्रष्ट पुलिसवाला (जिमी शेरगिल) उन्हें पकड़ लेता है और दुकानदार के मर्डर का इल्जाम लगा कर ब्लैकमेल करता है।
वह उन्हें अपना बिना कार्ड का एटीएम बना लेता है। पुलिसवाला जब जब कहता है, चारों दोस्तों को तब तब लाखों रुपये उसे देने पड़ते हैं। यह पैसा इतनी आसानी से और पलक झपकते आता है कि आप आश्चर्य करेंगे। मगर एक दिन चारों बगावत कर देते हैं। नतीजा यह कि पुलिसवाला उन्हें जिस्मफरोशी का गैंग चलाने की झूठे जुर्म में अंदर करवा देता है।
चारों युवा न्याय की लड़ाई हार जाते हैं और फिर अपने ढंग से सिस्टम तक अपनी आवाज पहुंचाना चाहते हैं। फिल्म कुछेक हिस्सों में जरूर ठीकठाक लगती है लेकिन अधिकांश जगह सब प्रयोजित और नकली मालूम पड़ता है। न सलीके का मनोरंजन है और न मैसेज।
हाल के वर्षों में निर्माता-निर्देशकों ने जनांदोलनों और अल्पमत सरकारों की जोड़तोड़ को भुनाने की खूब कोशिश की है। छोटे-बड़े निर्देशक मिलकर इसे दर्जनों बार दोहरा चुके हैं। यह बॉलीवुड सिनेमा का ‘अगली फेस’ है। जो बेहतरीन तकनीक और हल्ला बोल के अंदाज वाले प्रचारतंत्र के कारण चमकता मालूम पड़ता है।
तकनीक खराब उत्पाद को भी चमकदार बना देती है और प्रचारतंत्र गला फाड़ कर उसे बेचता है। निर्देशक कबीर सदानंद ने इससे पहले फ्लॉप फिल्में बनाई हैं और ‘फगली’ से यही पता चलता है कि उन्होंने पिछली गलतियों से सबक नहीं लिए।
जहां तक कलाकारों की बात है तो जिन बॉक्सर विजेंदर पर सबसे ज्यादा नजरें टिकी थी, वही सबसे ज्यादा निराश करते हैं। इसमें उनका कम और निर्देशक का ज्यादा दोष है। जबकि मोहित मारवाह और किआरा आडवाणी से भविष्य में उम्मीद की जा सकती है।