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इश्क और सेक्स का पाठ पढ़ाती है डेढ़ इश्किया

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संतों की वाणी में प्रेम के ढाई अक्षर बताए गए हैं। लेकिन बदले हुए, तेज रफ्तार और चालाक वक्त में लोगों के पास फुर्सत के पल कम हैं। इसलिए बॉक्स ऑफिस पर ‘डेढ़ इश्किया’ प्यार का नया तकियाकलाम है। जहां सबके चेहरों पर नकाब पड़े हैं। निर्देशक अभिषेक चौबे ने इन्हीं नकाबपोशों की कहानी कही है।
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यह फिल्म 2010 में आई ‘इश्किया’ का सीक्वल है। यहां इफ्तिखार हुसैन उर्फ खालूजान (नसीरूद्दीन शाह) और रज्जाक हुसैन उर्फ बब्बन मियां (अरशद वारसी) तो पहले की तरह दिलफेंक और बिगड़ैल हैं, लेकिन नए किरदारों के रूप में बेगम पारा (माधुरी दीक्षित) और मुनिया (हुमा कुरैशी) नए रंग भरती हैं।

प्रीक्वल की तरह इस बार कहानी में एक अनार और दो बीमार नहीं हैं, बल्कि खालू और बब्बन की नजरों के तीरे अलग-अलग चेहरों को निशाना बनाते हैं।

शायर, सूफी और नवाब

कहानी एक बार फिर खालूजान और बब्बन मियां द्वारा चोरी करने और फरार होने से शुरू होती है। भागते हुए दोनों बिछुड़ते हैं और खालू महमूदाबाद जा पहुंचते हैं। जहां की बेगम ने अपने लिए स्वयंवर रचा है। बेगम पारा ने अपने मरते हुए खाविंद को वचन दिया था कि दूसरा निकाह जरूर करेंगी और महमूदाबाद को उसका नया नवाब देंगी।

जवानी की सीढ़ियों से उतर रही बेगम पारा अब भी खूबसूरत हैं और उन पर मरने वालों की कमी नहीं है। खालू सूफी, शायर और नवाब चांदपुर बन कर उनका दिल जीतते हैं। लेकिन सचाई से पर्दाफाश करने के लिए वहां बब्बन मियां पहुंच जाते हैं। बब्बन सच कहें, इससे पहले ही उनका दिल बेगम पारा की अजीज मुनिया पर आ जाता है और वह खालू के साथ सपने बुनने लगते हैं।

अब दोनों यहीं निकाह करेगें और यहीं जिंदगी बिता देंगे। लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब पता चलता है कि इस स्वयंवर के पीछे एक राज है... जिसके खुलते ही सबकी जिंदगी उथल-पुथल हो जाती है।

इश्क और सेक्स में फर्क का पाठ

इस सीक्वल में ‘इश्किया’ की तरह दृश्य तो नहीं हैं, लेकिन बातें मजेदार हैं। शेरो-शायरी भी है। निर्देशक ने यहां इश्क की बारीकियों को दिखाने की कोशिश की है। प्यार के मारे खालूजान बब्बन मियां को समझाते हैं कि इस बार का प्यार सच्चा है। इश्क के सात मुकाम होते हैं। दिलकशी, उन्स, मोहब्बत, अकीदत, इबादत, जुनून और ...मौत।

तब बब्बन का मासूम सवाल होता है तो क्या इसमें सेक्स शामिल नहीं है? खालूजान की नजर में बब्बन ‘घाघरे का पिस्सू’ है... और नतीजतन बब्बन को मुनिया से भी प्यार भरी डांट मिलती है, ‘यही प्रॉब्लम है तुम आजकल के लौंडों में कि इश्क और सेक्स में फर्क नहीं कर पाते।’ शुरू से आखिर तक प्यार के अलग-अलग रंगों को दिखाती इस कहानी में कई मोड़ आते हैं जो दर्शकों को बांधे रखते हैं।

एमएलए साब उर्फ जान मोहम्मद खान

यूं तो फिल्म के सारे किरदार बेहतरीन हैं। लेकिन इनके बीच में एक रोल एमएलए साब उर्फ जान मोहम्मद खान यानि विजय राज का है। वाकई उन्हें सीक्वल की जान कहा जा सकता है। कहानी में एक तरफ खालू-बब्बन के साथ अगर बेगम पारा और मुनिया के आर्थिक स्वार्थ हैं, तो दूसरी तरफ जान मोहम्मद ही वह किरदार है जो वाकई आशिकी में डूबा हुआ है।

जो इश्क के छठे मुकाम यानी जुनून पर खड़ा है। वह बेगम पारा पर जान छिड़कता है और हर नामुमकिन कोशिश करके उन्हें पाना चाहता है। वैसे इस किरदार में रंग कुछ इस तरह से भरा गया है कि वह खलनायक की तरह नजर आता है! इसमें संदेह नहीं कि फिल्म देखने वालों को विजय राज लंबे समय तक याद रहेंगे।
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शेर मारा जाए या पढ़ा जाए

152 मिनट की इस फिल्म की कहानी और पटकथा रोचक है। यहां उर्दूदां माहौल है। यहां नवाबी तहजीब है। जो इनके चाहने वालों को भरपूर मजा देंगी। फिल्म में कई दृश्य और संवाद तालियां बटारते हैं।

प्यार की शायरी और रस्साकशी यहां एक साथ चलती है... और इसी का नतीजा है यह संवादः जब पिस्तौल हाथ में हो तो शेर पढ़ा नहीं जाता मारा जाता है। कुल मिला कर जिन दर्शकों को ‘इश्किया’ पसंद आई थी, उन्हें ‘डेढ़ इश्किया’ में भी मजा आएगा।
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