इस फिल्म में एक जगह पर हीरो हीरोइन से कहता है, ‘तुम्हारा प्यार भी अंडरवीयर की तरह निकला, जिसका इलास्किटक कभी न कभी ढीला पड़ जाता है।’ ‘मि. जो बी करवाल्हो’ को आप उसके इस एक डायलॉग में फिट कर सकते हैं। पूरी की पूरी फिल्म ढीली है। सिनेमाघर में घुसने के बाद आप इसके ढीलेपन से परेशान हो जाते हैं।
ढीली कहानी, ढीला निर्देशन, ढीली ऐक्टिंग, ढीला गीत-संगीत। देखते-देखते दिमाग टाइट हो जाता है। निर्मात-निर्देशक दोनों की यह पहली फिल्म है। लेकिन अरशद वारसी तो अनुभवी हैं। उन्हें क्यों समझ ही नहीं आया कि नाम से कॉमेडी लगने वाली इस फिल्म में दर्शकों को बोर करने वाले भरपूर मसाले हैं।
बेकार जासूस की बेकार कहानी
जासूस का नाम तो आप जान ही चुके हैं। लेकिन कुछ भी करवालो का दावा करने वाला यह जासूस जो बी (अरशद वारसी) किसी काम का नहीं है। ज्यादा से ज्यादा यह एक केबल कनेक्शन में दो टीवी देखने वालों और दूध में पानी मिलाने वाले दूधिये की चोरी पकड़ता है।
फिल्म इसी जासूस को कुछ लोगों द्वारा गलत समझ लिए जाने की कहानी है। कहानी में एक है अंतरराष्ट्रीय किलर कार्लोस (जावेद जाफरी) की, जिसे एक तानाशाहनुमा व्यक्ति ने अपनी प्रेमिका की शादी तोड़ने की सुपारी दी है।
एक और बिजनेसमेन खुराना (शक्ति कपूर) ने जो बी को प्रेमी के साथ भागी बेटी की पकड़ कर लौटाने का कॉन्ट्रेक्ट दे रखा है। कार्लोस और जो बी का मिशन एक-सा लगता है और गफलत पैदा होती है। कार्लोस को पकड़ने निकली इंस्पेक्टर शांतिप्रिया फड़निस (सोला अली खान) जो बी को कार्लोस समझ कर दुखी हो जाती है क्योंकि वह उसके बचपन का प्यार है।
वक्त ने तुम्हें बहुत बोरिंग बना दिया है
फिल्म यूं तो शुरू से ही बोर करने लगती है, लेकिन जैसे जैसे आगे बढ़ती है बोरियत बढ़ जाती है। कहानी के सारे सिरे गड्डमड्ड हैं। निर्देशक की पकड़ कहीं मालूम नहीं पड़ती। छोट-छोटे दृश्य कॉमेडी पैदा करने की नाकाम कोशिश करते हैं। अरशद ने जिस तरह से काम किया है, वह उनके लिए खतरे की घंटी है जो फिल्म के एक डायलॉग में साफ सुनी जा सकती है... वक्त ने तुम्हें बहुत बोरिंग बना दिया है।
यही सोहा की स्थिति भी है। यह प्रचार झूठा है कि फिल्म में उनका किरदार ‘दबंग’ के सलमान खान से प्रेरित है या उसकी याद दिलाता है। ऐसा कुछ नहीं है। पर्दे पर पहली बार सोहा के बिकनी पहनने की बात भले ही सही है, लेकिन वह दृश्य कुछ पल का है और यह सुंदरी उसमें कतई आकर्षित नहीं कर पाती। सोहा की ऐक्टिंग में भी दम नहीं है।
जावेद जाफरी को ऐक्टिंग करने से ज्यादा गेट-अप बदलने का काम मिला है। वे बार-बार नए रूप में दिखते हैं और किसी में भी प्रभावित नहीं करते। विजय राज और शक्ति कपूर का काम भी बेकार गया है।
मौत, पॉटी और कार्लोस का रिश्ता क्या है
यह साल 2013 की पहली फिल्म है। इस तरह से बॉक्स ऑफिस पर फिल्मों की शुरुआत अच्छी नहीं कही जा सकती। कहानी, पटकथा और संवाद महेश रामचंदानी के हैं। तीनों लिहाज से यह उनकी पहली फिल्म है। कॉमेडी के नाम पर इसमें जो भी चालू किस्म का माल भरा जा सकता था, भरा गया है।
‘मौत, पॉटी और कार्लोस कभी भी और कहीं भी आ सकते हैं...’ जैसा मुहावरा गढ़ने की कोशिश की गई है। जो एक मजाक तो हो सकता है, लेकिन उस पर विश्वास नहीं किया जा सका।
फिल्म का गीत-संगीत क्षणभंगुर है। हां, सोहा पर फिल्माया गया कैबरेनुमा गाना ‘चुम्मा-चाटी’ जरूर थोड़ा आकर्षक है। निर्देशक ने भविष्य में अगर इसी राह पर चलने का फैसला किया तो उनसे कुछ उम्मीद करना बेमानी होगी। अरशद को जरूर सोचना चाहिए कि इस तरह की फिल्मों से बच कर रहें।