निर्माताः सिद्धार्थ रॉय कपूर/सुनीता गोवारिकर
निर्देशकः आशुतोष गोवारिकर
सितारेः ऋतिक रोशन, पूजा हेगड़े, कबीर बेदी, अरुणोदय सिंह, नितीश भारद्वाज
रेटिंग **
मोहेंजो दारो के रूप में फिर ऐसा उदाहरण हमारे सामने है जो बताता है कि फिल्म सिर्फ पैसों से नहीं बनती। अकूत धन, उच्च तकनीक, मंजे हुए अभिनेता हों मगर कथा/पटकथा लचर रहे तो कुल जमा पानी फिर जाता है। आशुतोष गोवारिकर ने फिल्म के निर्देशन के साथ लेखन विभाग भी संभाला लेकिन नाकाम रहे। आशुतोष यह बता पाने में असफल हैं कि वह अंततः क्या दिखाना चाहते हैं? इतिहास, प्रेम कहानी या नदी पर बांध बनाने से उपजने वाले संकट!
वह सिंधु घाटी सभ्यता काल, उसके विकसित शहर मोहेंजो दारो में होने वाले करोबार को फिल्म में कला निर्देशकों की मदद से तो दिखा सके परंतु कहानी में उनका महत्व स्थापित करने तथा नायक-नायिका की प्रेम कथा में संतुलन नहीं बैठा सके। फिल्म थोड़ी-बहुत उन्हें ठीक लग सकती है जिनकी दिलचस्पी इतिहास दर्शन में है परंतु जो मनोरंजन की तलाश में जाएंगे वह निराश होंगे।
मोहेंजो दारो की सबसे बड़ी समस्या इसका लेखन है। न कहानी में नयापन है और न अंदाज-ए-बयां में। एक खलनायक, जो अत्याचारी शासक है। एक हीरोइन, जो पिता के वचन से बंधी होने के कारण खलनायक के बेटे से ब्याही जानी है। एक हीरो, जो बाहर से आया है और जनता तथा हीरोइन का उद्धार करेगा।
टकथा पूरी तरह हीरो केंद्रित और ईसा पूर्व इतिहास की सभ्यता के बारे में सीमित सूचना देती है। ऐसे दौर में जहां लोग औसत सूती किस्म के हाथ से सिले कपड़े पहनते हैं, फिल्म की नायिका रेशमी डिजाइनर ड्रेस में अवतार लेती है। उसकी लकदक पोशाक क्लीवेज और नाभि को विशेष रूप से उजागर किए रहती है।