फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

फिल्म समीक्षा/मोहेंजो दारो:प्रलय में डूबने का खतरा

Fri, 12 Aug 2016 04:00 PM IST
रवि बुले/ मुंबई ब्यूरो, अमर उजाला
विज्ञापन
विज्ञापन
निर्माताः सिद्धार्थ रॉय कपूर/सुनीता गोवारिकर
विज्ञापन

निर्देशकः आशुतोष गोवारिकर
सितारेः ऋतिक रोशन, पूजा हेगड़े, कबीर बेदी, अरुणोदय सिंह, नितीश भारद्वाज
रेटिंग **

मोहेंजो दारो के रूप में फिर ऐसा उदाहरण हमारे सामने है जो बताता है कि फिल्म सिर्फ पैसों से नहीं बनती। अकूत धन, उच्च तकनीक, मंजे हुए अभिनेता हों मगर कथा/पटकथा लचर रहे तो कुल जमा पानी फिर जाता है। आशुतोष गोवारिकर ने फिल्म के निर्देशन के साथ लेखन विभाग भी संभाला लेकिन नाकाम रहे। आशुतोष यह बता पाने में असफल हैं कि वह अंततः क्या दिखाना चाहते हैं? इतिहास, प्रेम कहानी या नदी पर बांध बनाने से उपजने वाले संकट!

वह सिंधु घाटी सभ्यता काल, उसके विकसित शहर मोहेंजो दारो में होने वाले करोबार को फिल्म में कला निर्देशकों की मदद से तो दिखा सके परंतु कहानी में उनका महत्व स्थापित करने तथा नायक-नायिका की प्रेम कथा में संतुलन नहीं बैठा सके। फिल्म थोड़ी-बहुत उन्हें ठीक लग सकती है जिनकी दिलचस्पी इतिहास दर्शन में है परंतु जो मनोरंजन की तलाश में जाएंगे वह निराश होंगे।
विज्ञापन


मोहेंजो दारो की सबसे बड़ी समस्या इसका लेखन है। न कहानी में नयापन है और न अंदाज-ए-बयां में। एक खलनायक, जो अत्याचारी शासक है। एक हीरोइन, जो पिता के वचन से बंधी होने के कारण खलनायक के बेटे से ब्याही जानी है। एक हीरो, जो बाहर से आया है और जनता तथा हीरोइन का उद्धार करेगा।

टकथा पूरी तरह हीरो केंद्रित और ईसा पूर्व इतिहास की सभ्यता के बारे में सीमित सूचना देती है। ऐसे दौर में जहां लोग औसत सूती किस्म के हाथ से सिले कपड़े पहनते हैं, फिल्म की नायिका रेशमी डिजाइनर ड्रेस में अवतार लेती है। उसकी लकदक पोशाक क्लीवेज और नाभि को विशेष रूप से उजागर किए रहती है।
विज्ञापन

नायक-नायिका कोई छाप नहीं छोड़ पाए

फिल्म को बनाने में कंप्यूटर तकनीक का काफी प्रयोग किया गया है और मोहेंजो दारो के कई एरियल दृश्य रचे गए हैं। बाजार, सिंधु नदी माता का मंदिर और विशाल बांध का सेट भी बार-बार आता है। इस विशाल नगर सभ्यता का बाजार चारदीवारी में कैद ग्रामीण मेले-सा दिखता है। ग्रीक सभ्यता के स्टेडियमनुमा अखाड़े में नायक की दो नरभक्षियों से लड़ाई सर्कस जैसी है। यहां हीरो-हीरोइन से लेकर तमाम किरदार जो हिंदी बोलते हैं, उस पर कई जगह हंसी आती है क्योंकि भाषा कृत्रिम मालूम पड़ती है। संवाद सहज नहीं लगते। फिल्म में प्लास्टिक के फूलों जैसा आभास कई जगह हावी है।

ऋतिक के अभिनय में नई बात नजर नहीं आती। उन्होंने अपने किरदार में ऐसा कुछ नहीं जोड़ा कि वह ईसा पूर्व 2016 के मानव लगें। वह मोटे-तगड़े मगरमच्छ को मारने से लेकर खलनायक और उसके लोगों को अकेले ठिकाने लगाने वाले बॉलीवुड हीरो ही हैं। पूजा हेगड़े अपनी पहली फिल्म में छाप छोड़ने में नाकाम हैं।

कबीर बेदी और अरुणोदय सिंह खलनायकी से अवश्य प्रभावित करते हैं। अरुणोदय अच्छे अभिनेता हैं और सही रोल मिलने पर उभरने की पूरी क्षमता उनमें है। निर्देशक के रूप में गोवारिकर की फिल्म पर पकड़ ढीली है। यह अवश्य है कि उन्होंने कल्पनाशीलता को ऊंची उड़ान दी है मगर एक भी तकनीकी खामी रह जाए तो रॉकेट आसमान में फट जाते हैं।

किताबों में दर्ज है कि मोहेंजो दारो की विकसित नगर सभ्यता एक महान जलप्रलय में डूब कर नष्ट हो गई थी। इतिहास खुद को दोहराता है। इस मोहेंजो दारों के सामने भी अपनी गलतियों के प्रलय में डूबने का खतरा बॉक्स ऑफिस पर मंडरा रहा है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें