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कट्टी बट्टी समीक्षाः गुजरा वक्त और गया पैसा नहीं लौटता

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निर्माताः सिद्धार्थ रॉय कपूर
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निर्देशकः निखिल आडवाणी
सितारेः इमरान खान, कंगना रनौत
रेटिंग *1/2

निखिल आडवाणी ने फिर वही किया, जिसके लिए जाने जाते हैं। सिर फिरा देने वाली फिल्म का निर्माण। कट्टी बट्टी उनके लिए है जो दो घंटे बोर होने के बाद आखिरी कुछ मिनटों में इमोशनल होना चाहते हैं।

आंसुओं में बोरियत बह जाती है लेकिन गुजरा वक्त और गया पैसा नहीं लौटता। यह फिल्म उनके लिए भी है जो देखना चाहते हैं कि क्वीन बन इठला रही कंगना औसत रोल में कैसे ‘दूसरी अमीषा पटेल’ बन जाती हैं!
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निर्देशक नए फिल्मी फार्मूले ढूंढ रहे हैं

अच्छी कहानियों की समझ के अभाव में निर्देशक नए फिल्मी फार्मूले ढूंढ रहे हैं। कट्टी बट्टी का आइडिया निर्देशक को ऐसे आया कि टूटे दिल की कहानियां खूब चलती हैं। दर्शक रोकर भी इन्हें देखते हैं। सोचिए कि मुकेश के दर्द भरे गीत कितने सुन जाते हैं! दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे एक बार बनी है, मगर देवदास तो बार-बार बनी है!

इस फार्मूले का सिरा पकड़ कर निखिल ने कट्टी बट्टी बुनी। मुंबई में पांच साल तक सिरफिरी पायल (कंगना) के साथ लिव-इन में रहने के बाद सिरफिरे मैडी (इमरान) का दिल टूट गया है। पायल झगड़ा कर छोड़ कर चली गई।

मगर मैडी उसे रह-रह कर याद कर रहा है। जगह-जगह ढूंढ रहा है। जबकि उसकी झक्की-सी बहन और दोस्त बार-बार समझा रहे हैं कि पायल को भूल जा। वह अपनी जिंदगी में आगे बढ़ गई। क्यों उसके लिए मर रहा है? मगर मैडी तो ‘मैड’ हुआ पड़ा है।

क्लाइमेक्स का पूरा प्रसंग करुणा खोकर हास्य में बदल जाता है

निखिल ने पायल-मैडी की जुदाई को दो घंटे तक तरह-तरह से इतना घिसा है कि कहानी में उतार-चढ़ाव नहीं रह जाते। दर्शक सोचता है कि निर्देशक दिखाना क्या चाहता है। ...और फिर जब क्लाइमेक्स आता है तो कुछ लोगों की आंखें भर आती है। बेचारी पायल कैंसर से मर रही है! इसलिए दोस्तों की मदद से वह चाहती है कि मैडी उससे नफरत करने लगे!! बहुत सारे दर्शक निर्देशक की सोच पर रोने लगते हैं।

निर्देशक ने कंगना के आखिरी महीनों के दृश्य च्युंगम जैसे चबाए हैं। यह दर्शक के धैर्य की कड़ी परीक्षा हैं। पायल बीमारी के अलग-अलग चरणों में अलग-अलग गेट-अप के साथ बार-बार लौटती है। जब लगता है कि वह नहीं रही, तभी आंखें खोल देती है! पूरा प्रसंग करुणा खोकर हास्य में बदल जाता है। नायक-नायिका के बीच किसी लाइलाज बीमारी के आने से प्रेम की त्रासदी पर पहले भी फिल्में बनी हैं।
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इमरान अपने मामा आमिर की कोशिशों के बावजूद प्रभावित नहीं करते

सचिन-रंजीता स्टारर अंखियों के झरोखे से (1978) और आदित्य पंचोली-रुखसार स्टारर याद रखेगी दुनिया (1992) सहज ही याद आती हैं। परंतु निखिल कट्टी बट्टी की ट्रेजडी को लिव-इन और कॉमेडी से जोड़ कर यही बताते हैं कि कहानी में उनका विश्वास कम था।

यह विश्वास उन खबरों के साथ बिल्कुल निचले तल पर मालूम पड़ता है, जो कहती हैं कि फिल्म की फाइनल एडिटिंग आमिर खान की देखरेख में हुई! इमरान अपने मामा की कोशिशों के बावजूद प्रभावित नहीं करते।

उनका चेहरा कॉलेज में पढ़ने वाले प्रेमी जैसा नहीं लगता। अगर कहीं उनके फैन हैं तो वे भी निराश ही होंगे। आप क्वीन और तनु वेड्स मनु-2 के बाद कंगना से प्रभावित हैं तो यह फिल्म देख कर उन पर तरस खाएंगे। कुल मिला कर निखिल आडवाणी ने दर्शकों को बोर करने का अपना रिकॉर्ड बरकरार रखा है।
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