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फिल्म समीक्षा/दो लफ्जों की कहानी:कुछ ना कहो

Fri, 10 Jun 2016 12:40 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला, मुंबई
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निर्माताः धीरज शेट्टी, धवल जयंतीलाल गाडा
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निर्देशकः दीपक तिजोरी
सितारेः रणदीप हुड्डा, काजल अग्रवाल, अनिल जॉर्ज, मामिक
रेटिंग *1/2

अगर फिल्म कागज पर सही ढंग से नहीं लिखी गई तो कितने ही अच्छे कलाकार, तकनीशियन और लोकेशन लीजिए, सब बेकार हैं। दो लफ्जों की कहानी में यही हुआ। अव्वल कहानी किसी बंद स्टोर में से झाड़पोंछ कर निकाली गई मालूम पड़ती है, दूजे पटकथा में भावनाओं को उद्वेलित करने वाले दृश्य तथा संवाद गायब हैं। जबकि यहां रिंग में फाइटिंग भी है और प्रेम में डूबे किरदार भी। आश्चर्य यह कि ऐसी कहानी के लिए भी निर्देशक ने एक कोरियाई फिल्म को आधार बनाया।

संभवतः इसकी वजह है कि दीपक तिजोरी भट्ट कैंप शिक्षित हैं, जिन्हें सबक मिला है कि रीमेक से कम मेहनत और कम समय में जल्दी काम हो जाता है। परंतु उसका नतीजा क्या आता है, यह सामने है!
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दो लफ्जों की कहानी में तर्क के तमाम सिरे खुले पड़े हैं। एक अनाथ बच्चा बड़ा होकर फ्री स्टाइल फाइटर बन गया है मगर किन्हीं वजहों से जेल की हवा खाकर बाहर निकला है। उसकी जिंदगी में एक नेत्रहीन लड़की आती। बातों-बातों में प्यार होता है और पता चलता है कि लड़की की आंखों की रोशनी अप्रत्यक्ष रूप से इसी फाइटर की वजह से चली गई थी। अब फाइटर चाहता है कि लड़की का इलाज हो जाए। वह देखने लगे।
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फिल्म दर्शक को किसी लिहाज से नहीं बांधती

दीपक तिजोरी ने प्रेम में बलिदान की भावना को अपने सिनेमा में बुना है। लेकिन कई सवालों को जवाब यहां नहीं मिलते। जबकि कुछ जगहों पर आप पहले से जानते हैं कि क्या होने वाला है। ऐसे में फिल्म दर्शक को किसी लिहाज से नहीं बांधती। फिल्म का सकारात्मक पक्ष इसके ऐक्टर हैं। रणदीप हुड्डा की क्षमताओं पर किसी को संदेह नहीं है। फिर भी फाइटर के रूप में तो वह जमते हैं, लेकिन उदास और चुप-चुप रहने वाले प्रेमी के किरदार में फिट नहीं बैठते। काजल अग्रवाल ने भी अपना काम सही ढंग से किया है।

हिंदी फिल्मों में पैर जमाने के लिए उन्हें इससे बेहतर रोल की जरूरत है। मिस लवली और मर्दानी जैसी फिल्मों से पहचान बनाने वाले अनिल जॉर्ज रणदीप के फादर फिगर के रूप में प्रभावी हैं। लेखक-निर्देशक जहां रणदीप के रोल में भावनाओं की गहराई को नहीं उकेर सके वहीं अनिल जॉर्ज की भूमिका को निर्णायक मोड़ तक नहीं पहुंचा सके।

जबकि फादर फिगर और अनाथ बच्चे के बीच स्नेह और तनाव के संबंध कहानी में कुछ खूबसूरत रंग भर सकते थे। खैर, रणदीप के हिस्से में यह एक और थोड़ा है थोड़े की जरूरत है टाइप फिल्म होगी। फिल्म देख कर आपको यही लगेगा कि कुछ ना कहो।
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