निर्माताः धीरज शेट्टी, धवल जयंतीलाल गाडा
निर्देशकः दीपक तिजोरी
सितारेः रणदीप हुड्डा, काजल अग्रवाल, अनिल जॉर्ज, मामिक
रेटिंग *1/2
अगर फिल्म कागज पर सही ढंग से नहीं लिखी गई तो कितने ही अच्छे कलाकार, तकनीशियन और लोकेशन लीजिए, सब बेकार हैं। दो लफ्जों की कहानी में यही हुआ। अव्वल कहानी किसी बंद स्टोर में से झाड़पोंछ कर निकाली गई मालूम पड़ती है, दूजे पटकथा में भावनाओं को उद्वेलित करने वाले दृश्य तथा संवाद गायब हैं। जबकि यहां रिंग में फाइटिंग भी है और प्रेम में डूबे किरदार भी। आश्चर्य यह कि ऐसी कहानी के लिए भी निर्देशक ने एक कोरियाई फिल्म को आधार बनाया।
संभवतः इसकी वजह है कि दीपक तिजोरी भट्ट कैंप शिक्षित हैं, जिन्हें सबक मिला है कि रीमेक से कम मेहनत और कम समय में जल्दी काम हो जाता है। परंतु उसका नतीजा क्या आता है, यह सामने है!
दो लफ्जों की कहानी में तर्क के तमाम सिरे खुले पड़े हैं। एक अनाथ बच्चा बड़ा होकर फ्री स्टाइल फाइटर बन गया है मगर किन्हीं वजहों से जेल की हवा खाकर बाहर निकला है। उसकी जिंदगी में एक नेत्रहीन लड़की आती। बातों-बातों में प्यार होता है और पता चलता है कि लड़की की आंखों की रोशनी अप्रत्यक्ष रूप से इसी फाइटर की वजह से चली गई थी। अब फाइटर चाहता है कि लड़की का इलाज हो जाए। वह देखने लगे।