निर्माताः संजय सूरी, ओनिर, एनएफडीसी
निर्देशकः बिकास रंजन मिश्रा
सितारेः संजय सूरी, तनिष्ठा चटर्जी, सोहम मित्रा, रिद्धी सेन, एना साहा, धृतिमान चटर्जी
रेटिंग***
यह कलात्मक सिनेमा है। उन दर्शकों को पसंद आएगा जो सिने-महोत्सवों में दिखाई जाने वाली फिल्में पसंद करते हैं। जिन्हें जीवन के यथार्थ को कला की आंख से देखना भाता है। झारखंड से आए युवा निर्देशक बिकास रंजन मिश्रा की यह पहली फिल्म है और वह बेहतर भविष्य की उम्मीद जगाते हैं। मसाला फिल्मों के विपरीत चौरंगा संवेदनाओं, प्रतीकों और बिंबों के सहारे अपनी बात कहने की कोशिश करती है। बिकास अपने प्रयास में काफी हद तक कामयाब हैं।
फिल्म दो किशोरवय दलित भाइयों संतू (सोहम मित्रा) और बजरंगी (रिद्धि सेन) के इर्द-गिर्द घूमती है, लेकिन इसमें उनकी मां (तनिष्ठा चटर्जी), गांव के मुखिया (संजय सूरी) और मंदिर के पुजारी (धृतिमान चटर्जी) के भी अहम किरदार हैं। बाहर पढ़ने वाला बजरंगी छुट्टी में गांव लौटा है और संतू के साथ समय गुजार रहा है।
उधर, संतू को मुखिया की गोरी-सुंदर बेटी मोना (एना साहा) से प्यार हो रहा है। इसका विपरीत छोर यह कि मुखिया के संतू-बजरंगी की मां के साथ शारीरिक संबंध हैं। मंदिर का पुजारी अंधा और यौन कुंठित है। उसकी कुंठाओं की कोई सीमा नहीं।