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फिल्म समीक्षा: 'ऑल इज वेल' फिल्म में नहीं कुछ भी वेल

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निर्माताः टी सीरीज/एलकैमी फिल्म्स, निर्देशकः उमेश शुक्ला, सितारेः अभिषेक बच्चन, असिन, ऋषि कपूर, सुप्रिया पाठक, मोहम्मद जीशान अयूब खान
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रेटिंग *1/2

अगर आपकी जिंदगी में सब कुछ ठीकठाक है तो ऑल इज वेल जैसी फिल्म आपका मनोरंजन नहीं कर सकती। अभिषेक बच्चन का सदा तना हुआ सख्त चेहरा और चढ़ी हुई आंखें। बगैर ग्लैमर वाली चुप-चुप-सी असिन। रोमांस के नाम पर दोनों के बीच जमी हुई बर्फ। इन बातों के बीच मुख्य कहानी ऐसी कि आप बोर ही हो जाएं।

म्यूजिक में दिल को छूने वाली बात नहीं और निर्देशक दो राहे पर कि फिल्म को कॉमेडी बना दे या सीरीयस पारिवारिक टीवी ड्रामा। ऑल इज वेल देखते हुए आप साफ महसूस करते हैं, ऑल इज नॉट वेल। वास्तव में यह फिल्म किसी कहानी का कम और ऐक्टरों के सैट-अप का नतीजा ज्यादा है।
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अगर कोई निर्देशक अभिषेक बच्चन, ऋषि कपूर और असिन को साथ काम करने के लिए राजी कर ले तो कोई भी प्रोड्यूसर पैसे का दांव खेल जाएगा। कहानी की फिर परवाह नहीं। वह बिकाऊ न हो, उबाऊ हो तो भी चलेगी।

निर्देशक ही समझा सकते हैं, वो कर क्या रहे हैं

ऑल इज वेल ऐसे पंजाबी भल्ला परिवार की कहानी है जिसमें पति-पत्नी (ऋषि कपूर-सुप्रिया पाठक) के बीच सदा झगड़ा होता रहता है। इसका बुरा असर बेटे (अभिषेक बच्चन) पर पड़ता है। बड़ा होकर वह परिवार से दूर बैंकॉक चला जाता है। वहां पंजाबी के म्यूजिक एलबम बन रहे हैं!! वहीं क्यों बन रह हैं, यह निर्देशक उमेश शुक्ला ही बता सकते हैं।

परिस्थितियां हीरो को वापस हिंदुस्तान लाती हैं। यहां माता-पिता मुश्किलों में फंसे हैं। हीरो मुश्किलों को सुलाझने की कोशिश करते हुए अंततः पाता है कि उसने अपने परिवार को देखने का जो चश्मा लगा रखा है उसका नंबर गलत है! निर्देशक ने हीरो को आज का श्रवण कुमार बताने की कोशिश की है।

फिल्म एक लिहाज से टू-इन-वन है। जहां हीरो-हीरोइन और उसके माता-पिता की कहानी का ट्रेक 90 फीसदी सीरियस और दस फीसदी कॉमेडी है, वहीं विलेन के हिस्से 90 फीसदी कॉमेडी और 10 फीसदी गंभीरता है। यह अजीब किस्म का घालमेल है। अभिषेक और असिन की जोड़ी नहीं जमती।
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अभिषेक बच्चन को जमाने की एक और कोशिश

वास्तव में यह फिल्म अभिषेक बच्चन को एकल हीरो के रूप में जमाने का एक और प्रयास है। यह विचार करने योग्य है कि राजनीति में जो स्थिति राहुल गांधी की है, क्या वही बॉलीवुड में अभिषेक बच्चन की है? हीरो होकर भी अभिषेक फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी हैं। रोमांस उनके हिस्से आया नहीं। कहीं से वह रॉक स्टार टाइप दिखे नहीं। आइटम डांस में जमे नहीं।

बेटे के रूप में उनके चेहरे पर हर परिस्थिति में एक जैसे भाव रहे। असिन के हिस्से फिल्म में करने को कुछ नहीं था। ऋषि कपूर जरूर छाप छोड़ते हैं लेकिन बेटे के रूप में कोई सशक्त कलाकार सामने होता तो वह और निखर सकते थे। स्मृति ईरानी भाग्यशाली हैं कि देश सेवा के लिए उन्हें इस फिल्म से विदा होना पड़ा।

इन सबके बीच मोहम्मद जीशान अयूब खान जरूर कॉमिक विलेन के रूप में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराते हैं। आपने उन्हें तनु वेड्स मनु रिटर्न्स में वकालत की पढ़ाई करते हुए कंगना को रिझाते देखा होगा।
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