निर्माता-निर्देशकः ए.आर. मुगरादौस
सितारेः सोनाक्षी सिन्हा, अनुराग कश्यप, कोंकणा सेन शर्मा
रेटिंग **
महिला सशक्तिकरण। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ। इस वैचारिक पृष्ठभूमि में ए.आर. मुरगादौस ने अकीरा में ऐक्शनवाला बॉलीवुड तड़का मारा है। सिनेमा यहां इरादों पर भारी है और कहानी फिल्मी फार्मूलों से लैस है। सोनाक्षी सिन्हा यहां हीरो हैं। मुश्किल यह कि ऐक्शन फिल्मों में हीरो के जिस बिंदास अंदाज की जरूरत होती है, वह सोनाक्षी में सिरे से गायब है। वह पूरी फिल्म में थकी, उदास, अकेली हैं जो किसी से पंगा नहीं लेना चाहती परंतु हालात उन्हें लगातार उस दिशा में ढकेलते हैं।
ऐसे में दुष्ट खलनायक का दम निकाल देने के लिए कहानी और किरदार जिस पंच की मांग करते हैं वह किसी सूरत किसी फ्रेम में यहां नहीं दिखता। सोनाक्षी का सारा ऐक्शन गैर-इरादतन, रक्षात्मक नजर आता है। जो मजा नहीं देता। अतः ऐक्शन से भरे कथा/पटकथा/संवाद फिल्म को एंटरटेनमेंट की सीमा रेखा तक नहीं ले जा पाते।
अकीरा ऐसी लड़की है, जिसके पिता उसे आत्मरक्षा के लिए जूडो/बॉक्सिंग सिखाते हैं। वह कमउम्र में ही अकेले चार-पांच अपने से कहीं बड़े लड़कों को पीट डालती है मगर इस पिटाई के दौरान उस पर तेजाब फेंकने की कोशिश करता युवक खुद ही शिकार बन जाता है। रसूखदार पिता अकीरा को अदालत में दोषी साबित कराते हुए उसे लड़कियों के रिमांड होम भिजवा देता है। यहां से निकली युवा अकीरा (सोनाक्षी सिन्हा) सिर्फ पढ़ाई करना चाहती है परंतु पिता के गुजर जाने पर उसे मां के साथ जोधपुर से भाई के पास मुंबई जाना पड़ता है। वहां उसका कॉलेज में एडमीशन होता है और वह हॉस्टल में रहती है।
दो घंटे की फिल्म लंबी लगती है
घटनाचक्र ऐसे घूमता है कि अकीरा पुलिस के चंगुल में फंस जाती है और एनकाउंटर जैसे हालात बन जाते हैं। स्थिति और बिगड़ती है जब अकीरा एनकाउंटर से तो बच निकलती है परंतु उसे पागल घोषित करने के लिए मनोचिकित्सा अस्पताल में भर्ती करा दिया जाता है। यहां उसे मिलते हैं बिजली के झटके और सलाखों वाली कोठरी। इन हालात में डाल देने वाले क्रूर पुलिसवालों से अकीरा अब कैसे निपटेगी?
फिल्म दो घंटे से थोड़ी अधिक है परंतु सीमित घटनाओं को खींचने की वजह से बहुत लंबी महसूस होती है। पहला हाफ ठीक है मगर दूसरे हिस्से में कहानी ठहरी रहती है। अस्पताल में बीमार बनाई जा रही सोनाक्षी का ट्रेक कुछ ही मिनटों में बोझिल हो जाता है। फिल्म में कई अहम किरदार हैं, अकीरा की मां-भाई-भाभी, भाभी का भाई, कॉलेज प्रिंसिपल, अकीरा से पंगा लेने वाले स्टूडेंट्स का ग्रुप, चार भ्रष्ट-हत्यारे पुलिसवाले, एक प्रेग्नेंट महिला पुलिस अधिकारी। मगर लेखक ने कहानी में इन्हें सही ढंग से नहीं बुना। कुछ अलग ढंग से बात को आगे बढ़ाने का प्रयास करते वे एकदम फिल्मी तर्क पर आ जाते हैं। अकीरा-केंद्रित होने से लेखक-निर्देशक के हाथों से कई चीजें फिसल गईं।
अजय देवगन की गंभीरता और सलमान/अक्षय का ऐक्शन मिला कर अकीरा बनाने की कोशिश नजर आती है। परंतु बात जमती नहीं। ऐक्शन के लिए जरूरी फिटनेस वाले खांचे में भी सोनाक्षी फिट नहीं बैठतीं। अकीरा ग्लैमर, रोमांस और कॉमेडी से शून्य है। गीत-संगीत भी उल्लेखनीय नहीं है। अनुराग कश्यप जरूर अपने शुरूआती दो-तीन दृश्यों में चौंकाते हैं पर फिर रूटीन नेगेटिव किरदार में बदल जाते हैं। कोंकणा की प्रतिभा का यहां दुरुपयोग हुआ है। फिल्म केवल सोनाक्षी के फैन इस उत्सुकतावश देख सकते हैं कि अकीरा बनी वह कैसी दिख रही हैं।