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Do Deewane Seher Mein Movie Review: अच्छा विषय पर कमजोर पेशकश; सिद्धांत-मृणाल की मेहनत पर लेखक ने फेरा पानी

सार

Do Deewane Seher Mein Review: फिल्म 'दो दीवाने सहर में' आज शुक्रवार को रिलीज हो गई है। सिद्धांत चतुर्वेदी और मृणाल ठाकुर अभिनीत यह एक रोमांटिक फिल्म है। दर्शकों की उम्मीदों पर फिल्म कैसी है? पढ़िए रिव्यू
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दो दीवाने सहर में - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
दो दीवाने सहर में
कलाकार
सिद्धांत चतुर्वेदी , मृणाल ठाकुर , इला अरुण , जॉय सेनगुप्ता और आयशा रजा मिश्रा
लेखक
अभिरुचि चंद
निर्देशक
रवि उद्यावर
निर्माता
संजय लीला भंसाली , प्रेरणा सिंह , उमेश कुमार बंसल और भारत कुमार रंगा
रिलीज डेट:
20 फरवरी 2026
रेटिंग
2/5

विस्तार
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दो दीवाने सहर में एक मॉडर्न रोमांटिक ड्रामा है। इसमें दो लोग - शशांक और रोशनी,  अपनी पर्सनल प्रॉब्लम्स के साथ रिश्ता निभाने की कोशिश करते हैं। लीड एक्टर्स सिद्धांत चतुर्वेदी और मृणाल ठाकुर ने अपने किरदारों को ईमानदारी से निभाया है। लेकिन फिल्म की राइटिंग और इसकी धीमी गति उनके इमोशंस को मज़बूत बनने नहीं देती। डायरेक्टर रवि उदयावर फिल्म को रियलिस्टिक रखने की कोशिश करते हैं। फिर भी स्क्रीनप्ले कई जगह सुस्त और दोहराव वाला महसूस होता है। इसका असर पूरी फिल्म पर पड़ता है।

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दो दीवाने सहर में - फोटो : सोशल मीडिया
कहानी
कहानी शशांक (सिद्धांत चतुर्वेदी) के इर्द-गिर्द घूमती है। वह एक अंडरकॉन्फिडेंट लड़का है जिसे 'श' और 'स' बोलने में दिक्कत होती है। इसी वजह से वह पब्लिक स्पीकिंग से दूर भागता है। उसका यह स्पीच इश्यू उसकी पर्सनैलिटी का बड़ा हिस्सा है। रोशनी (मृणाल ठाकुर) दूसरी तरफ है, जो अपने लुक्स को लेकर असुरक्षित रहती है। उसकी यह सोच उसकी भावनात्मक स्थिरता को प्रभावित करती है। दोनों धीरे-धीरे एक-दूसरे को समझते हैं और उनके बीच बॉन्ड बनता है। लेकिन कहानी बहुत धीमी चलती है। कई सीन बार-बार वही बातें दोहराते हैं। भावनात्मक गहराई भी जितनी हो सकती थी, उतनी नहीं बन पाती। स्टोरी आगे बढ़ती है, पर अनुमान लगाना आसान रहता है। किरदारों की ग्रोथ भी अधूरी लगती है। कहानी का विषय असल में अच्छा है। आज के 'फिल्टर वाले जमाने' में, जहां लोग अपनी कमियां छुपाते हैं, वहां इन्सेक्युरिटी और पर्सनल स्ट्रगल को सीधा दिखाना एक सही निर्णय था। लेकिन इसकी प्रस्तुति उतनी मजबूत  नहीं बन पाई।

दो दीवाने सहर में - फोटो : इंस्टाग्राम@mrunalthakur
एक्टिंग
एक्टिंग अच्छी है। सिद्धांत ने शशांक की झिझक और नर्वसनेस को बहुत नैचुरल तरीके से दिखाया है। मृणाल ने रोशनी की असुरक्षा को शांत और कंट्रोल्ड अभिनय से पेश किया है। लेकिन दोनों की केमिस्ट्री मजबूत नहीं लगती। सीन में कनेक्शन दिखता है, पर स्पार्क या खिंचाव कम महसूस होता है। रोमांटिक फिल्मों में यह बहुत जरुरी होता है। इनके बॉन्डिंग मोमेंट्स ठीक हैं, लेकिन भावनात्मक तीव्रता हल्की रहती है। साइड कैरेक्टर्स भी सही से डेवलप नहीं किए गए। इससे कहानी का माहौल थोड़ा खाली-सा लगता है।

दो दीवाने सहर में - फोटो : यूट्यूब ग्रैब
डायरेक्शन
डायरेक्शन साफ-सुथरा है। लेकिन फिल्म की गति एक जैसी नहीं रहती। कई सीन लंबे लगते हैं और ट्रांजिशन स्मूथ नहीं हैं। कुछ हिस्सों में फिल्म फ्लैट महसूस होती है। विज़ुअल चॉइसेज सिंपल हैं और उनमें विविधता कम है। इसलिए फिल्म देखने में भी औसत लगती है। एडिटिंग टाइट नहीं है, जिससे कहानी कई जगह खिंचने लगती है। इमोशनल बिल्ड-अप भी पूरा नहीं बन पाता। क्लाइमैक्स भी उम्मीद के मुकाबले कम प्रभावी लगता है। आइडिया अच्छा था, पर उसका एक्सीक्यूशन उतना एंगेजिंग नहीं बन सका।

दो दीवाने सहर में - फोटो : इंस्टाग्राम @bhansaliproductions
म्यूजिक
म्यूजिक फिल्म का कमजोर हिस्सा है। गाने सुनते समय ठीक लगते हैं, पर याद नहीं रहते। बैकग्राउंड स्कोर भी सीन्स  को मजबूत नहीं बनाता। रोमांटिक फिल्म में म्युजिक महत्वपूर्ण होता है, पर यहां  गाने सिर्फ  जगह भरते नजरआते हैं। फिल्म खत्म होने के बाद कोई धुन या लाइन मन में नहीं ठहरती।
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देखें या नहीं
कुल मिलाकर, दो दीवाने सहर में एक निराशाजनक फिल्म साबित होती है। अच्छे इरादे के बावजूद फिल्म अपने किसी भी पहलू में प्रभाव नहीं छोड़ पाती। एक्टिंग ईमानदार है, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले, बेहद धीमी गति, किरदारों में लगभग शून्य केमिस्ट्री और कमजोर  संगीत - सब मिलकर इसे और भी फीका बना देते हैं। कहानी आगे बढ़ने के बजाय अटकती हुई लगती है,इमोशनल  पल असर नहीं छोड़ते और रोमांस बनावटी सा महसूस होता है। इंटरवल तक आते-आते फिल्म भारी लगने लगती है और दूसरे हाफ में तो बिल्कुल खिंचती हुई महसूस होती है। अगर आप अच्छी, गहरी या एंगेजिंग लव स्टोरी की उम्मीद से जा रहे हैं, तो यह फिल्म आपको लगभग निश्चित रूप से निराश करेगी।

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