कलाकार: कोंकना सेन शर्मा, प्रियांशु, चितरंजन और प्रसाद रेड्डी
निर्देशक: तनूजा चंद्रा
लेखक: गजल धालीवाल
ओटीटी: ईरॉस नाउ
परदा चाहे बड़ा हो या छोटा, दमदार अदाकारा कोंकना सेन शर्मा का अभिनय देखना हमेशा सुख देता है। हिंदी सिनेमा में वह इन दिनों कम दिखती हैं। तलवार, अकीरा, लिपस्टिक अंडर माई बुर्का उनकी पिछले चार-पांच साल की यादें हैं। कोंकना का दुख यह है कि अब फिल्में महिलाओं के उम्रदराज किरदारों पर नहीं लिखी जातीं। ऐसा ही दुख कुछ कुछ निर्देशक तनूजा चंद्रा का भी रहा होगा, जिनकी पिछली फिल्म करीब करीब सिंगल को गुजरे दो साल हो चुके हैं।
तनूजा और कोंकना दोनों मिले हैं ईरॉस नाउ की एक शॉर्ट फिल्म में जिसका नाम है, ए मॉनसून डेट। मुंबई में मॉनसून की दस्तक के साथ ही रिलीज हुई इस शॉर्ट फिल्म से दोनों को तमाम उम्मीदें भी रही होंगी। तनूजा को हमेशा सिनेमा में लीक तोड़ने में मजा आता है। अपने मजे के लिए ही उन्होंने यह फिल्म भी बनाई है। शॉर्ट फिल्मों का एक सेट पैटर्न आमतौर पर देखा जाता है, कहानी पहले फ्रेम से साफ रहती है।
ए मॉनसून डेट की कहानी बूंद बूंद आपके जेहन में जमा होती है। कहानी एक महिला की है जिसकी अकेलेपन से निपटने की कोशिशें परत दर परत फिल्म में खुलती हैं। किरदार जमाने को तनूजा ने कलाकार खूब जुटाएं हैं, बस इन कलाकारों को कलाबाजियां वह नहीं सिखा पाईं। गजल धावीलाल की कहानी किसी नज्म जैसी तैरती है और कभी इस सिरे तो कभी उस सिरे टकराते हुए क्लाइमेक्स के मुहाने पर जा अटकती है।
अदाकारी के मामले में कोंकना सेन शर्मा ने बहुत कोशिश की है ये जताने की कि वह रिटायर नहीं हुई हैं। यहीं कहीं हैं। आसपास। कोई तो निर्देशक हो जो उन्हें बधाई हो में नीना गुप्ता जैसा दमदार किरदार दे सके। निर्देशन में तनूजा चंद्रा भी यही गुहार लगाते दिखती हैं। तनूजा सिनेमा की बदलती संवेदनाओं की दौड़ में पीछे छूट चुकीं तकनीशियन हैं। इन दोनों की जुगलबंदी में रस नहीं है और ए मॉनसून डेट का सूनापन ही इसकी चुनौती बनकर इसके सामने खड़ा हो जाता है।