हरीश खन्ना, मृणाल कुलकर्णी
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म ‘ढाई आखर’ का जब ट्रेलर रिलीज हुआ, तभी से ये तय था कि ये फिल्म देखनी है। उत्सुकता यही देखने की थी कि ‘तीर्थाटन के बाद’ की कहानी को कैसे परदे पर रचा गया होगा? कहानी उस दौर की है जब चिट्ठियां लिखना भी किसी शौक से कम नहीं होता था। पत्रिकाओं में सितारों की तरह ही लेखकों के पते छपते। उनके प्रशंसक उनकी रचनाओं पर अपनी राय जाहिर करने के लिए चिट्ठियां लिखते। न जाने कितने रिश्ते इन पातियों के आने जाने से बने हैं। फिल्म ‘ढाई आखर’ भी उसी दौर की कहानी है। आज के दौर की नहीं, जब व्हाट्सएप पर मैसेज लिखने के मिनट भर में जवाब न आने पर मौजूदा पीढ़ी तुरंत एक क्वेश्चन मार्क भेजने में गुरेज नहीं करती। उसे ये भी अंदाजा नहीं कि संदेश को भेजने का, उसके पहुंचने का, पढ़े जाने का और फिर उसका जवाब आने का इंतजार क्या ही मजा देता था। बकौल गालिब, कासिद के आते आते खत इक और लिख रखूं, मैं जानता हूं वो जो लिखेंगे जवाब में..
बस कासिद यानी संदेश लाने ले जाने वाले दौर की इस कहानी में एक ऐसी संवेदना की बात है जब पति के अत्याचार से दिन रात कुढ़ती रही अपनी सास को विधवा होने के बाद छोटी बहू पत्रिकाएं पढ़ने को प्रेरित करती है। एक अनजान पुरुष को बिना चाहे उसकी पत्नी बनकर रहने, उसके साथ रातें बिताने और फिर बिना मर्जी के ही उसका अंश धारण करने के ‘पाप’ से उसे मुक्ति मिलती तब दिखाई देती है, जब पत्रिका में छपी एक कहानी उसे अपनी सी महसूस होती है। कहानी महिलाओं के उत्पीड़न पर है। ऐसी कहानियां हर काल में होती रही हैं। इक्कीसवीं सदी में भी अनचाहे ब्याहों को ढोती जोड़ियों को ‘मुक्ति’ का रास्ता आसान नहीं है। यहां हर्षिता को श्रीधर के लेखन में ये मुक्ति नजर आती है। दोनों के भाव चिट्ठियों की स्याही से निकलकर श्याम होते हैं। और, फिर वो शाम भी आती है जब दोनों साथ होते हैं। और, इसी बात पर हर्षिता के जवान बेटे और बड़ी बहू घर पर बवाल कर देते हैं।
फिल्म ‘ढाई आखर’ बनाने के लिए पहले तो इसके निर्माताओं की तारीफ होनी चाहिए कि ‘गणपत’ जैसी फिल्मों के दौर में वे ऐसी फिल्म बनाने की हिम्मत भी जुटा पाए। ऐसी फिल्मों का बनना ही एक यज्ञ है और फिल्म का रिलीज होना पूर्ण आहुति। बीते साल इफ्फी गोवा में दिखाई गई फिल्म को सेंसर सर्टिफिकेट हासिल किए साल भर से ज्यादा हो चुका है, लेकिन फिल्म की कहानी ऐसी है कि इसे पांच साल, 10 साल बाद या कभी भी देखा जाएगा, फिल्म की ताजगी बरकरार रहेगी। और, इसमें बड़ी भूमिका निभाई है इसके मुख्य कलाकारों मृणाल कुलकर्णी और हरीश खन्ना ने। मृणाल कुलकर्णी का अदाकारी में अपना एक अलग मुकाम रहा है। टेलीविजन पर धारावाहिक ‘श्रीकांत’ और बड़े परदे पर ‘कमला की मौत’ से हिंदी दर्शक उनके मुरीद रहे हैं। वह परदे पर होती हैं तो एक अलग ही आभा चक्र उनके चारों तरफ खिंचा रहता है। एक विधवा के किरदार में देखकर शुरू में तो झटका लगता है लेकिन कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ती है। उनका किरदार लोगों को हमसफर बनाता जाता है और मंजिल पर पहुंची कहानी के उपसंहार पर लोगों के हाथों से तालियां बेसाख्ता बजने लग जाती हैं।
प्रसन्ना बिष्ट, मृणाल कुलकर्णी
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म ‘ढाई आखर’ जहां अटकती है, वे मोड़ बेचैनियों भरे भी हैं और मजबूरियों भरे भी। ऐसी कहानियों में बड़े सितारे काम करने से कतराते हैं। लेखक श्रीधर के किरदार में सोचिए कि कहीं गुलजार खुद होते तो इस फिल्म का पैमाना क्या होता? हरीश खन्ना को यहां मैं किसी तरह कमतर आंकने की कोशिश नहीं कर रहा लेकिन उनकी देहयष्टि और उनका प्रभाव किसी ऐसे लेखक का परदे पर नजर नहीं आता जिसको देखकर दर्शक भी उनके साथ हो लें। मृणाल के दोनों बेटों की कास्टिंग और खराब है। हां हर्षिता के पति के रूप में रोहित कोकटे ने कर्कशता पूरी बनाए रखी है। फिल्म में मृणाल के बाद जिस दूसरे कलाकार का अभिनय सबसे ज्यादा प्रभावित करता है, वह हैं उभरती अभिनेत्री प्रसन्ना बिष्ट। प्रसन्ना इसके पहले ‘फर्रे’ और ‘डेढ़ बीघा जमीन’ में लोगों को उनका नाम जानने के लिए मजबूर करने भर को प्रभावित कर चुकी हैं। उनका सहज और सरल अभिनय उनकी मजबूती है। एन चंद्रा जैसा निर्देशक कोई मिला तो इस ‘अबोध’ के ‘मोहिनी’ बनते देर नहीं लगेगी।
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