कंगना की एक्शन स्टार बनने की कोशिश
फिल्म ‘धाकड़’ के ट्रेलर के बाद से इस फिल्म से दर्शकों को काफी उम्मीदें रही हैं। उनके पहले भी तमाम अभिनेत्रियों ने एक्शन स्टार बनने की कोशिशें की हैं। फियरलेस नाडिया से लेकर दीपिका पादुकोण तक तमाम अभिनेत्रियों ऐसा करने के प्रयास कर चुकी हैं या कर रही हैं। लेकिन, कंगना का मामला थोड़ा अलग है। वह फिल्म ‘धाकड़’ में उमा थर्मन बनना चाह रही हैं। क्वैंटिन टैरिंटिनो की ‘किल बिल’ सीरीज सी दिखती इस फिल्म में कंगना ने जितनी मेहनत की है, वह दर्शनीय है। वह एक सीक्रेट एजेंट बनी हैं जो दुनिया भर में फैले एक ऐसे जाल को तोड़ना चाहती है जिसका सूत्रधार भारत में है। कहानी विदेश से शुरू होकर वापस अपने देश आती है। निशाने पर है एक कोयला माफिया जो दूसरे तमाम अपराधों में अरसे से लिप्त है। उसकी एक पार्टनर भी है। कहानी अपने विचार के स्तर पर ऐसी किसी एक्शन फिल्म के लिए बिल्कुल सही है। लेकिन, इसकी पटकथा? फिल्म ‘धाकड़’ यहीं मात खाती है।
अच्छे विचार पर बनी खराब फिल्म
एक जबर्दस्त ट्रेलर की झलक दिखाकर दर्शकों को बेहद उत्साहित करने वाली फिल्म ‘धाकड़’ के निर्देशक रजनीश घई इस फिल्म के सबसे बड़े गुनहगार हैं। उन्होंने कंगना रणौत को कहानी का जो नरेशन दिया होगा और जिसके चलते कंगना ने इस फिल्म को करने की हामी भरी होगी, उसे वह परदे पर हू ब हू दिखाने से चूक गए। वह कंगना को एक्शन क्वीन तो बनाते हैं लेकिन इंसानी जज्बात ठीक से कहानी में उभरने नहीं देते। फिल्म में ठहराव की भारी कमी है और इसके किरदार लीक से इतर होते हुए भी मसाला फिल्मों की घिसी पिटी लीक पर ही भागते नजर आते हैं। फिल्म की मेकिंग में पानी की तरह पैसा बहाया गया दिखता है लेकिन इसका असर जैसा होना चाहिए था, वह हो नहीं सका।
कंगना रनौत की 'धाकड़' का पोस्टर
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कंगना का करिश्मा कायम
अभिनय के मामले में कंगना ने अपनी कूवत एक बार फिर से दिखाई है। अलग अलग रूपों में वह कमनीय भी दिखती हैं और खूंखार भी। फिल्म में एक संवाद है, ‘तुम्हारी दिक्कत ये है कि तुम खुद को मसीहा समझने लगी हो।’ इस एक संवाद में कंगना की सारी मेहनत का रिपोर्ट कार्ड छुपा हुआ है। कंगना को वन मैन आर्मी बनने से बचने की जरूरत है। सिनेमा टीम वर्क का मामला है। यहां वह अपने से काबिल निर्देशकों का साथ पाकर ही करिश्मा कर सकती है और ऐसा करने में वह सक्षम भी हैं। बस उनका अपना अति आत्मविश्वास उनकी फिल्मों में रोड़े अटका रहा है।
धाकड़ फिल्म में कंगना रणौत
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फरमे में फंसे कलाकार
फिल्म के बाकी कलाकार कहानी के रिक्त स्थानों की पूर्ति से ज्यादा कुछ नहीं करते। अर्जुन रामपाल सिर्फ अतीत वाले हिस्से में असरदार हैं। दिव्या दत्ता की मेहनत भी बेकार जाती दिखती है। यही काम उन्होंने किसी बेहतर फिल्म में किया होता तो शुक्रवार का दिन उनकी जय जयकार के नाम होता। शारिब हाशमी का अपने पर से नियंत्रण हट रहा है। शोहरत कमाने के बाद उनके पैसे कमाने के दिन हैं और उनके काम को देखकर लगने भी लगा है कि वह अब बस ज्यादा से ज्यादा काम करना चाहते हैं। शाश्वत चटर्जी का अभिनय का अपना दायरा है और उनकी हिंदी सिनेमा में ‘बॉब बिस्वास’ वाली पहचान का लोग फायदा भी उठाना चाह रहे है।
तेत्सुओ की प्रभावी सिनेमैटोग्राफी
तकनीकी रूप से फिल्म ‘धाकड़’ सिर्फ इसकी सिनेमैटोग्राफी के लिए देखी जा सकती है। जापानी छायाकार तेत्सुओ नगाता ने पूरी फिल्म को एक अलग अंदाज में शूट किया है। इसका कलर पैलेट इसका प्रभाव भी अच्छा ही छोड़ता है। रंगों और रोशनी के साथ किए गए उनके प्रयोग बड़े परदे पर आकर्षित भी करते हैं लेकिन उनकी इस सजावट में कहानी की आत्मा खो जाती है। फिल्म के संवाद अच्छे हैं। और, फिल्म खत्म होने के बाद याद भी रह जाते हैं, मसलन ‘जिस्म से रूह अलग करना बिजनेस है मेरा’ या फिर ‘कठपुतलियां हैं हम सब, डोर ऊपर वाले के हाथ में अब भी है..।’ ध्रुव घानेकर का पार्श्वसंगीत हिंदी फिल्म के हिसाब से शोर जैसा लगता है। उनके संगीत में ताल कम है और शोर ज्यादा। फिल्म के गाने सबसे ज्यादा बोर करते हैं।
देखें कि न देखें
फिल्म ‘धाकड़’ अपने ट्रेलर से बंधी उम्मीदों पर नाकाम रही फिल्म है। अगर आप कंगना रणौत के धाकड़ प्रशंसक हैं तो ही सिनेमाघर जाकर यह फिल्म देखें। बाकी आम दर्शकों को ये फिल्म देखने के लिए इसके ओटीटी पर आने का इंतजार करना ही ठीक रहेगा।