लोकेश कनगराज की बतौर लीड अभिनेता पहली फिल्म ‘डीसी’ सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। यूं तो लोकेश काे आप सभी ‘कैथी’, ‘मास्टर’, ‘विक्रम’, ‘लियो’ और ‘कुली’ जैसी सुपरहिट फिल्में देने वाले निर्देशक के रूप में जानते होंगे पर आपको बता दें कि वो इससे पहले भी कई फिल्मों में अभिनय कर चुके हैं। आपने उन्हें 'मास्टर' में कैदी और 'जन नायकन' में एक पत्रकार के रोल में देखा होगा पर यहां देवदास बनकर लोकेश ने जो कहर ढाया है, वह आपको लंबे वक्त तक याद रहेगा।
फिल्म की कहानी एक लोकल गैंग के इर्द-गिर्द बुनी गई है जो पुलिस से बचकर भाग रही है। कहानी भले ही थोड़ी आगे-पीछे है, कभी धीमी तो कभी तेज है पर ओवरऑल यह एक नई तरह की फिल्म है जिसमें बस प्रेजेंटेशन ही हीरो है।
कहानी
अब आगे क्या होता है? चंद्रा और पार्वती का क्या रिश्ता है? क्या दास पुलिस से बच पाएगा? यह सब जानने के लिए आप फिल्म देख सकते हैं।
अभिनय
दास के किरदार को लोकेश ने बड़े ही खूबसूरत तरीके से पेश किया है। उसका दर्द, उसका गुस्सा और इस सबके बीच जो लोगों का भला करने की उसकी आदत है सब बड़ा ही निराला लगता है। एक्शन सीन्स में लोकेश ने जो किया है वो आपको तालियां बजाने पर मजबूर कर देगा। पूरी फिल्म में लोकेश बोले कम पर उन्होंने अपनी चुप्पी से असर ज्यादा किया है।
चंद्रा के रोल में वामिका ने कई लेयर्स पेश कीं। पहले वाे खूबसूरत और लगीं और फिर खतरनाक। उन्हें मिला यह अब तक का सबसे बेहतरीन किरदार है जिसमें वो निखरकर सामने आईं। बाकी कलाकारों में संजना कृष्णमूर्ति, थलईवासल विजय, बालाजी देवीप्रसाद और आडुकलम नरेन ने अपना काम बखूबी निभाया।
निर्देशन
इससे पहले धनुष के साथ 'कैप्टर मिलर' बना चुके अरुण माथेश्वरन ने इस फिल्म में भी सबकुछ एकदम रॉ रखा है। एक्शन सीन और अनिरुद्ध रविचंदर का बैकग्राउंड म्यूजिक इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं पर वहीं बार-बार भटकती हुई कहानी और धीमा होता स्क्रीनप्ले कहीं-कहीं आपको बोर करते हैं। वैसे कई बार यह भी महसूस होता है कि फिल्म अगर सुलझी होती तो यह आपको बोर करती, यह कॉम्प्लेक्स है तभी आपको इसे देखने में मजा आता है।
देखें या नहीं
अलग और नई तरह की फिल्म देखना चाहते हैं तो इसे देखना चाहिए। वामिका के फैन हैं तो इसे जरूर देखें। बस ध्यान रहे कि फिल्म में मार-काट वाले दृश्य कुछ ज्यादा ही हैं।