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Dacoit Movie Review: दमदार दिखे मृणाल और अदिवि शेष, क्लाइमेक्स भी जबरदस्त; फिर कहां चूकी ‘डकैत’? पढ़ें रिव्यू

सार

Dacoit Movie Review: अदिवि शेष और मृणाल ठाकुर अभिनीत फिल्म 'डकैत' आज 10 अप्रैल को सिनेमाघरों में लग चुकी है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह एक लव स्टोरी फिल्म है। मगर, एक्शन और इमोशंस भी हैं। कैसी ही फिल्म? यहां पढ़िए रिव्यू
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'डकैत' फिल्म रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
डकैत एक प्रेम कथा
कलाकार
अदिवी शेष , मृणाल ठाकुर , अनुराग कश्यप , अतुल कुलकर्णी , प्रकाश राज और जरीना वहाब
लेखक
अदिवी शेष और शनील देव
निर्देशक
शनील देव
निर्माता
सुप्रिया यारलागड्डा, आनंद रेड्डी कर्नाटी, श्रीनिवास कुमार इसेट्टी
रेटिंग
2.5/5

विस्तार
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जातिवाद, जेल से फरार, पुराना प्यार, 1 करोड़ की मजबूरी और एक बड़ा खेल..., फिल्म 'डकैत: एक प्रेम कथा' सुनने में जितनी दिलचस्प लगती है, फिल्म उतनी ही उलझी हुई नजर आती है। नीयत अच्छी है, लेकिन उसे पर्दे पर उतारने में फिल्म चूक जाती है। फिल्म की शुरुआत आपको बांधती है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, इसकी पकड़ ढीली पड़ती जाती है और दर्शक सोचने लगता है कि आखिर फिल्म कहना क्या चाहती है?

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'डकैत' फिल्म रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
कहानी
कहानी हरिदास (अदिवी शेष) की है, जो 13 साल जेल में बिताने के बाद बाहर निकलने की फिराक में है। उसके पास एक प्लान है। पैसे जुटाओ और विदेश निकल जाओ। लेकिन, उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा अधूरा चैप्टर है जूलियट (मृणाल ठाकुर), जिसे वह अपने जेल जाने की वजह मानता है। जब दोनों वर्षों बाद आमने-सामने आते हैं, तो मामला सिर्फ प्यार का नहीं रहता। यहां जरूरत, गुस्सा और मजबूरी तीनों साथ खड़े नजर आते हैं। कहानी में लॉकडाउन का बैकड्रॉप भी है, जहां अस्पतालों में अफरा-तफरी का माहौल है। इसी दौरान हरिदास को पता चलता है कि एक अस्पताल के अंदर भारी मात्रा में काला पैसा घूम रहा है, जिसे अस्पताल का मालिक (प्रकाश राज) संभाल रहा है।

जूलियट अपने किसी करीबी के इलाज के लिए 1 करोड़ रुपये जुटाने में लगी है और हरिदास इस मौके को एक प्लान में बदल देता है। कहानी में कई मौके आते हैं जहां यह बहुत मजबूत बन सकती थी, लेकिन फिल्म बार-बार डायरेक्शन बदलती है और असर कमजोर हो जाता है। शुरुआत में ही कहानी काफी हद तक प्रेडिक्टेबल लगने लगती है। हालांकि, दूसरे हाफ में खासकर क्लाइमेक्स के आसपास कुछ हिस्से दिलचस्प जरूर बनते हैं।

'डकैत' फिल्म रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
एक्टिंग
मृणाल ठाकुर इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। उनका किरदार सिर्फ रोने या मजबूरी दिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें एक स्ट्रेंथ भी है। क्लाइमैक्स में वह फिल्म को संभाल लेती हैं। अदिवी शेष का रोल दमदार है। उन्होंने एंग्री मैन वाला अंदाज अच्छे से निभाया है, लेकिन उनका किरदार एक जैसा नहीं रहता। कभी कमजोर तो कभी अचानक बहुत ताकतवर हो जाते हैं, जिससे ऑडियंस का कनेक्शन टूटता है।
अनुराग कश्यप स्क्रीन पर आते ही ध्यान खींचते हैं। भले ही रोल छोटा हो। अतुल कुलकर्णी अपने अनुभव से किरदार में वजन लाते हैं। प्रकाश राज एक भ्रष्ट अस्पताल मालिक के रोल में दिखते हैं, लेकिन उनका ट्रैक और ज्यादा मजबूत हो सकता था।

डकैत - फोटो : यूट्यूब
डायरेक्शन, स्क्रीनप्ल, लेखन
डायरेक्टर शनील देव अपनी सोच को स्क्रीन पर सही से बैलेंस नहीं कर पाते। फिल्म कभी एक्शन थ्रिलर बनती है, कभी इमोशनल ड्रामा और कभी लव स्टोरी, लेकिन इनमें से कोई भी ट्रैक पूरी मजबूती से नहीं उभर पाता। इस वजह से फिल्म की पहचान साफ नहीं बनती। स्क्रीनप्ले फिल्म को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। पहला हाफ धीमा है और कई सीन बिना असर के गुजर जाते हैं। दूसरे हाफ में खासकर आखिरी 30 मिनट में फिल्म थोड़ी पकड़ बनाती है और यहां कुछ सीन सच में अच्छे लगते हैं। लेकिन पूरी फिल्म को संभालने के लिए यह काफी नहीं है।
कहानी में आइडियाज तो हैं, लेकिन नया कुछ नहीं है। सब कुछ पहले देखा-सा लगता है। फिल्म इतनी जल्दी प्रेडिक्टेबल हो जाती है कि इंटरवल तक आते-आते आप अंदाजा लगाने लगते हैं और ज्यादातर बार सही भी निकलते हैं। लॉजिक कई जगह छुट्टी पर चला जाता है। कुछ ट्रैक शुरू होते हैं, लेकिन ठीक से खत्म नहीं होते। डायलॉग्स भी बस काम चलाऊ हैं। ना कोई लाइन ठहरती है, ना थिएटर से बाहर निकलते वक्त कुछ याद रहता है।

तकनीकी पक्ष
फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक काफी अच्छा है और कई सीन को बेहतर बना देता है। सिनेमैटोग्राफी फिल्म को एक अच्छा लुक देती है। गाने ठीक हैं, लेकिन थिएटर से बाहर निकलते ही याद नहीं रहते।
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डकैत - फोटो : सोशल मीडिया
देखें या नहीं?
अगर आप अदिवी शेष और मृणाल ठाकुर के फैन हैं, तो फिल्म एक बार देख सकते हैं। फैन होने के भी कुछ फर्ज होते हैं। फिल्म में अच्छे कलाकार और दिलचस्प सेटअप होने के बावजूद कमजोर लेखन और बिखरे स्क्रीनप्ले के कारण यह एक औसत अनुभव बनकर रह जाती है। कुल मिलाकर, अगर आप एक मजबूत कहानी, नया कंटेंट और दिमाग से खेलती फिल्म देखने जा रहे हैं, तो यहां आपकी उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा, क्योंकि फिल्म में सब कुछ है। बस वही नहीं जो इसे यादगार बना सके।

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