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Daayra Movie Review: कानून या एनकाउंटर? मेघना गुलजार की फिल्म ने सवाल तो उठाया, लेकिन जवाब देने में खुद उलझी

सार

Daayra Movie Review in Hindi: करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन की फिल्म 'दायरा' 18 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज होगी। अगर आप भी ये फिल्म देखने का मन बना रहे हैं, तो इससे पहले जान लीजिए कैसी है फिल्म और इसकी कहानी? 
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दायरा फिल्म रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
दायरा
कलाकार
करीना कपूर खान , पृथ्वीराज सुकुमारन , जितेंद्र जोशी और क्षिती जोग
लेखक
यश केसवानी , सीमा अग्रवाल और मेघना गुलजार
निर्देशक
मेघना गुलजार
निर्माता
विनीत जैन , धवल गाडा और अमृता पांडे
रिलीज डेट
18 सितंबर 2026
रेटिंग
2/5

विस्तार
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'तलवार' और 'राजी' जैसी धारदार और झकझोर देने वाली फिल्में देने वाली निर्देशक मेघना गुलजार जब भी पर्दे पर उतरती हैं, तो दर्शकों को उनसे कुछ हटकर और गहरा देखने की उम्मीद होती है। इस बार वह करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन जैसे मंजे हुए कलाकारों को लेकर क्राइम-थ्रिलर 'दायरा' लेकर आई हैं।
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फिल्म का मुद्दा बेहद संवेदनशील है...देश में एक बलात्कार का मामला और उसके बाद पुलिसिया एनकाउंटर की सच्चाई। लेकिन क्या यह फिल्म मेघना की पिछली मास्टरपीस फिल्मों की कसौटी पर खरी उतरती है? आइए जानते हैं।

दायरा फिल्म रिव्यू - फोटो : इंस्टाग्राम @kareenakapoorkhan
कहानी
फिल्म की शुरुआत एक झकझोर देने वाले संवाद से होती है...'फिर से एक फैमिली ने अपनी बेटी खोई है... फिर से...' कहानी एक 24 साल की लड़की के साथ हुए गैंगरेप और हत्या के इर्द-गिर्द घूमती है।

एक तरफ सीनियर पुलिस रमन (पृथ्वीराज सुकुमारन) और उनकी टीम है, जो इस 'ओपन एंड शट केस' को कुछ ही दिनों में चारों आरोपियों के एनकाउंटर के साथ खत्म कर देती है। दूसरी तरफ है SIT हेड अजोनी (करीना कपूर खान), जो कानून के दायरे में रहकर काम करती है।

फिल्म अतीत और वर्तमान के धागों पर चलती है। एक तरफ दिखाया जाता है कि कैसे शुरुआती दौर में पुलिस ने लापरवाही बरती... परिवार को भटकाया और अगर थोड़ी गंभीरता दिखाई होती तो शायद वह लड़की बच सकती थी।

वहीं दूसरी तरफ, करीना का किरदार पुलिस के उस एनकाउंटर पर सवाल खड़े करता है और उसकी फाइल री-क्रिएट करता है।

लेकिन कहानी धीरे-धीरे एक दूसरे सवाल की तरफ बढ़ती है। जब पुलिस किसी अपराधी तक पहुंच जाती है तो क्या उसका काम सिर्फ उसे कानून के हवाले करना है? और अगर न्याय की प्रोसेस लंबी हो....तो क्या पुलिस को अपनी तरफ से कोई फैसला लेने का अधिकार है?

रमन और अजूनी इसी सवाल को दो अलग-अलग नजरिए से देखते हैं।

दायरा फिल्म रिव्यू - फोटो : इंस्टाग्राम @kareenakapoorkhan
अभिनय
पृथ्वीराज सुकुमारन: पृथ्वीराज सुकुमारन को पुलिस अफसर के किरदार में पहले भी देखा गया है। 'मुंबई पुलिस’ में भी वह इसी दुनिया का हिस्सा रहे हैं, लेकिन ‘दायरा’ में उनका तरीका अलग है। मुंबई पुलिस में उनका किरदार ज्यादा जटिल था और उसमें कई भावनात्मक परतें थीं।

दायरा में किरदार ज्यादा सीधा है। इसलिए पृथ्वीराज का अभिनय अच्छा होते हुए भी उनकी पूरी क्षमता का इस्तेमाल नहीं करता। फिल्म में वह पूरे समय एक ऐसे अफसर नजर आते हैं, जिसे अपने फैसले पर पूरा भरोसा है। पृथ्वीराज ने इसे दिखाने के लिए ज्यादा गुस्सा या शोर नहीं किया। कई जगह उनका शांत रहना ही काफी लगता है।

करीना कपूर खान: करीना कपूर खान की अजूनी कहानी में रमन से अलग सोच रखती हैं। वह हर बात पर सवाल करती हैं और जांच को दोबारा देखती हैं। करीना ने किरदार को सहज रखा है, लेकिन उनका एक जैसा मुस्कुराते रहना कई जगह खटकता है।

शुरुआत में लगता है कि इसके पीछे कोई वजह है, लेकिन बाद में यही बात अजीब लगने लगती है। अजूनी के किरदार में जिस गुस्से और बेचैनी की जरूरत थी, वह करीना के अभिनय में पूरी तरह नहीं आ पाती। करीना का काम ठीक है, लेकिन उनके किरदार से जितनी उम्मीद बनती है, उतना असर अंत तक नहीं रहता।

बाकी कलाकार: कंवलजीत सिंह, अचिंत कौर, सीमा आजमी, अनुजा साठे, जितेंद्र जोशी,बिस्वापति सरकार, उपेंद्र चौहान, क्षिती जोग ने भी अच्छा साथ दिया है। हालांकि इन कलाकारों को अपनी छाप छोड़ने के लिए ज्यादा जगह नहीं मिली।

दायरा फिल्म रिव्यू - फोटो : इंस्टाग्राम @kareenakapoorkhan
निर्देशन
बतौर निर्देशक मेघना गुलजार इस बार पूरी तरह फॉर्म में नजर नहीं आतीं। 'तलवार' जैसी बेजोड़ फिल्म बनाने वाली निर्देशक का निर्देशन यहां थोड़ा कमजोर और दिशाहीन लगता है। फिल्म के मुख्य कलाकारों (पृथ्वीराज और करीना) के बीच टकराव और संवाद बहुत सीमित हैं और डायरेक्टर यह तय नहीं कर पातीं कि वह असल में किस पक्ष का समर्थन करना चाहती हैं...कानून का या एनकाउंटर का?
ऐसा महसूस होता है कि खुद मेघना के पास भी इस बात का कोई पुख्ता जवाब नहीं था, जिससे अंत में दर्शकों के मन में भी कन्फ्यूजन और एक अधूरापन रह जाता है।

दायरा फिल्म रिव्यू - फोटो : इंस्टाग्राम @kareenakapoorkhan
स्क्रीनप्ले और लेखन
फिल्म का स्क्रीनप्ले और राइटिंग काफी खिंची हुई और कमजोर है। फिल्म का फर्स्ट हाफ पृथ्वीराज की इन्वेस्टिगेशन, सीसीटीवी फुटेज खंगालने और संदिग्धों से सामान्य पूछताछ में ही निकल जाता है, जिसमें कोई खास रोमांच या नयापन नहीं दिखता। फिल्म के किरदार (खासकर पुलिसवाले) में वह अग्रेशन और फ्रस्ट्रेशन नजर नहीं आती जो ऐसे सेंसिटिव सब्जेक्ट की मांग थी।

क्लाइमैक्स तक आते-आते यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि मेकर्स दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करना चाहते हैं कि क्या न्याय में देरी होने पर पुलिस द्वारा एनकाउंटर ही एकमात्र रास्ता है। लेकिन अंत तक अजूनी के सवालों को कमजोर कर देना और रमन के फैसले को गलत साबित न करना स्क्रिप्ट की सबसे बड़ी कमजोरी बन जाता है।
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फिल्म 'दायरा' - फोटो : इंस्टाग्राम@kareenakapoorkhan
देखें या नहीं?
अगर आप मेघना गुलजार की 'तलवार' या वैसी ही दमदार और थ्रिल से भरी फिल्मों की उम्मीद लगाकर सिनेमाहॉल जा रहे हैं, तो थोड़ी मायूसी हाथ लग सकती है। बलात्कार के बाद परिवार का दर्द और सिस्टम की बेरुखी कुछ पलों के लिए जरूर अंदर तक झकझोर देती है, लेकिन फिल्म की कमजोर बनावट और उलझा हुआ क्लाइमैक्स इसे एक साधारण सी कहानी बनाकर छोड़ देता है।

अगर आप सिर्फ पृथ्वीराज की एक्टिंग और एक गंभीर मुद्दे के नाम पर वीकेंड पर कुछ देखना चाहते हैं, तो एक नजर डाल सकते हैं; वरना सिनेमा के लिहाज से यह एक औसत और निराश करने वाला अनुभव ही साबित होगा।

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