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Crazxy Movie Review: सोहम शाह की हिम्मत की नई लकीर खींचती फिल्म, ओटीटी पर जब भी आए मिस मत करना

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'क्रेजी' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
क्रेजी
कलाकार
सोहम शाह , शिल्पा शुक्ला , निमिषा सजायन और टीनू आनंद आदि
लेखक
गिरीश कोहली
निर्देशक
गिरीश कोहली
निर्माता
अमिता शाह , मुकेश शाह और सोहम शाह
रिलीज
28 फरवरी 2025
रेटिंग
3/5

सिनेमा इन दिनों सरप्राइज का दूसरा नाम है। 'जवान', 'पठान', 'गदर 2', 'एनिमल', 'पुष्पा 2' और 'छावा' क्या हैं? सब अपनी अपनी श्रेणी के दर्शकों को अपने कौतूहल से भरमाती हैं, उन्हें अचरज में डालती हैं और उन्हें ये सोचने को मजबूर करती फिल्में हैं, कि शायद, कहीं न कहीं तो ऐसा वाकई में हो सकता है। इस पैमाने पर लेखक, निर्देशक गिरीश कोहली को सौ में सौ नंबर दिलाती फिल्म ‘क्रेजी’ सिनेमाघरों तक पहुंची है तो इसमें इसके अभिनेता और निर्माता सोहम शाह की हाल ही में दोबारा रिलीज फिल्म ‘तुम्बाड’ का बड़ा हाथ है। सोहम ने ‘तुम्बाड’ को दोबारा रिलीज करके फिल्म वितरकों को ये दिखाया कि देश में दर्शकों की पूरी एक पीढ़ी ऐसी तैयार हो चुकी है जो चलताऊ मसाला फिल्मों से इतर भी कुछ देखना चाहती है, वह भी थियेटर में आकर। अंग्रेजी की ऑफबीट हॉरर फिल्मों के देश में बन चुके दर्शक वर्ग को देसी फिल्मों की कितनी चाह रही है, ये ‘शैतान’ में साबित हो चुका है। ‘क्रेजी’ ऐसा ही कुछ सस्पेंस फिल्म के जरिये करने की कोशिश करती है, हालांकि क्लाइमेक्स पर आकर कन्फ्यूज हो जाती है कि कहानी का अंत क्या हो?

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'क्रेजी' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
किसी ऑडियो वीडियो को देखते समय उसके आकर्षण में अब दर्शक को 30 सेकंड में बांधना चुनौती हो चला है और ये 30 सेकंड वाली कोशिशें करने वाले भी लाखों में हैं। यहां गिरीश कोहली की तारीफ इसलिए करनी बनती है कि वह पूरे 90 मिनट दर्शकों को बांध कर रखने में सफल रहते हैं, बस आखिर के तीन मिनट और संभल जाते तो क्या ही बात होती। जिनको ये फिल्म देखते हुए सुनील दत्त की सोलो फिल्म ‘यादें’ याद आएगी, वे यह भी जानते हैं कि इस तरह की फिल्में समीक्षकों की तारीफें तो पा लेती हैं लेकिन दर्शकों को उनकी टिकट का पैसा वसूल करा पाने की चुनौती उनके सामने मुंह बाए खड़ी रहती है। ‘क्रेजी’ के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है। लेकिन, ध्यान ये रखना है कि अगर सिनेमाघर जाकर ये फिल्म देखने का मन नहीं बन रहा है, तो ओटीटी पर इसके आते ही इसे देखना न भूलें। 

'क्रेजी' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कहानी भी फिल्म ‘क्रेजी’ की थोड़ी अलग सी है। ‘गोली मार भेजे में’ वाले दौर के सिनेमा में ‘अभिमन्यु चक्रव्यूह में फंस गया है तू’ दौर के सिनेमा का छौंक मारकर कहानी कुछ यूं सामने आती है कि अपने पेशे की चुनौतियों से जूझ रहे एक डॉक्टर को उसकी बेटी का अपहरण हो जाने का फोन आता है। मामला पांच करोड़ रुपये पर आकर अटकता है। पैसे हैं उसके पास। लेकिन, झटका ये है कि बाप अपनी बेटी को चाहता ही नहीं है। वजह जो है वह इस हीरो की इज्जत काटकर चार इंच छोटी कर देती है। मामला ऊंट की पीठ से बने स्पीडब्रेकर पर कार के उछलने के समय ड्राइवर का सिर छत में टकराने वाली रफ्तार से आगे बढ़ता है। भावनाओं में दर्शक बहने भी लगते हैं। कार और कलाकार एक होते हैं, उसकी जिंदगी के हमसफर आवाजें बनकर माहौल बनाते हैं। शिल्पा शुक्ला और टीनू आनंद तो खैर काबिल कलाकार हैं ही, नजर आपको निषिषा सजायन पर रखनी होगी, जिनकी वेब सीरीज ‘डब्बा कार्टेल’ भी इसी शुक्रवार को रिलीज हुई है।

'क्रेजी' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
जैसा कि आपको अब तक समझ आ ही गया है कि ये फिल्म एक प्रयोगात्मक फिल्म है। इसमें फिल्म के अधिकतर हिस्से में सिर्फ और सिर्फ सोहम शाह हैं। गिरीश कोहली ने फिल्म की पटकथा इतनी चुस्त बुनी है कि अगर आपने खुद को एक ही हीरो को डेढ़ घंटे की फिल्म देखने के लिए मानसिक रूप से तैयार कर लिया है तो ये फिल्म आपको आनंद देगी। लेकिन, फिल्म देखना सिनेमाघर में सामूहिक आनंद का विषय है। साथ में दो चार दोस्त लेकर ये फिल्म देखने जाने पर भी बात बन सकती है, लेकिन परिजनों के साथ ये फिल्म देखना थोड़ा चुनौती भरा है। और, इस चुनौती से पार पाना ही फिल्म ‘क्रेजी’ के लिए सबसे बड़ा काम है। 
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'क्रेजी' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कलाकारों में चूंकि कैमरा पूरे समय सोहम शाह पर ही फोकस रहता है और सोहम शाम ने फिर एक बार ये साबित किया है कि फिल्म का विषय अच्छा हो तो दर्शक उसे पसंद करते हैं। उनकी संवाद अदायगी हालांकि अभी मेहनत मांगती है और हिंदी के सही उच्चारण में भी वह अटकते हैं। इसके अलावा सोहम हर बार की तरह इस बार भी बॉक्स ऑफिस की गणित के चक्रव्यूह में फंस चुके हैं। 140 करोड़ की आबादी वाले देश में अब भी सिनेमाघर जाकर फिल्म देखने वाले हफ्ते के डेढ़ करोड़ लोग भी नहीं हैं। देश में खास तरह की फिल्मों के लिए छोटे थियेटरों की सहूलियत कम कीमत वाली टिकटों पर शुरू हो तो इनका एक अलग डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम तैयार होकर ‘क्रेजी’ जैसी फिल्मों का भला कर सकता है। 
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