वेब सीरीज 'चूना' की कहानी एक ऐसे पॉलिटिशियन शुक्ला की है, जो उत्तर प्रदेश की राजनीति को अपने जेब में लेकर घूमता है। सरकार किसी भी पार्टी ही हो, सत्ता में तभी आती है, जब शुक्ला का समर्थन उस पार्टी को मिलता है। लेकिन जब किंग मेकर खुद ही किंग बनने की सोचता है तो ग्रहों की चाल बदलने लगती है। शुक्ला की एस्ट्रोलॉजी, वास्तु शास्त्र में घोर आस्था है। जब तक ग्रह उनकी कुंडली के अनुकूल नहीं होते तब तक वह कोई बड़ा फैसला नहीं लेता है। शुक्ला खुद को उत्तर प्रदेश का भावी मुख्यमंत्री मानता है और वह सही समय का इंतजार कर रहा है कि कब वह अपनी चाल चले। शुक्ला का मानना है कि सितारों और ग्रहों की चाल से राजनीति चलती है। इसलिए वह हमेशा हवा में उड़ता रहता है।
शुक्ला की एक स्थानीय गुंडे से सफल राजनेता बनने की कहानी है। आदमी जैसे-जैसे सफलता की सीढ़ी चढ़ता जाता है, वैसे-वैसे अपने पीछे दुश्मनों की एक फौज भी खड़ी करता रहता है। शुक्ला इस बात से निश्चिंत है कि कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता, यह सत्य भी है। क्योंकि ताकतवर आदमी अपने से कमजोर लोगों पर ध्यान नहीं देता है। लेकिन वह भूल जाता है कि कैसे कमजोर आदमी मिलकर एक ताकतवर आदमी को गिरा देते हैं। जब सारे दुश्मन एक साथ मिलकर शुक्ला के साम्राज्य में सेंध लगाते हैं, तो शुक्ला के राजनीतिक करियर में क्या हड़कंप मचता है। और, शुक्ला उनसे बचने के लिए क्या कदम उठाता है। पूरी सीरीज की कहानी इसी के इर्द- गिर्द घूमती है। कहानी में जबरदस्त ट्विस्ट तब आता है जब एक पंडित, एक मुखबिर, एक गली का गुंडा, एक पुलिस अधिकारी, एक सफल ठेकेदार मिलकर शुक्ला के घर से 600 करोड़ रुपये लूटने की योजना बनाते है।
अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी को लेकर 'धूमकेतु' जैसी फिल्म बना चुके निर्देशक पुष्पेंद्र नाथ मिश्रा ने वेब सीरीज 'चूना' के जरिए उत्तर प्रदेश की राजनीति को एस्ट्रोलॉजी से जोड़कर एक गंभीर मुद्दे को ह्यूमरस के साथ पेश किया गया है। इंसान कितना भी शक्तिशाली क्यों ना हो जाए उनके कर्मों का फल उसे जरूर मिलता है। इस सीरीज में अंधविश्वास और कर्म के बीच द्वंद दिखाया गया है। पॉलिटिशियन शुक्ला ग्रहों की दशा के हिसाब से दसों उंगलियों में रत्न जनित अंगूठियां पहने हैं। उसका मानना है कि ग्रह अनुकूल न हो, तो भी उन ग्रहों को अनुकूल कैसे बनाया जा सकता है? कहानी यहां इसलिए लड़खड़ाती है क्योंकि लोगों को भले अपने भविष्यफल में दिलचस्पी सबसे ज्यादा होती है लेकिन ज्योतिष वही है जो जीवन मर्म समझाए। यहां सारा खेल ही बनावटी दिखता है।
कलाकारों में काफी लंबे समय के बाद अभिनेता जिमी शेरगिल एक दमदार भूमिका में दिखे हैं। इत्मीनान से उनके संवाद बोलने का अंदाज काफी अच्छा है। आसिम गुलाटी, विक्रम कोचर, चंदन रॉय, नमित दास, मोनिका पवार, अतुल श्रीवास्तव ने अपनी अपनी भूमिका के साथ पूरी तरह से न्याय करने की कोशिश की है लेकिन सीरीज का समग्र प्रभाव कमजोर रह जाता है। म्यूजिक भी इसकी बड़ी कमजोर कड़ी है। अगर म्यूजिक पर थोड़ा और घ्यान दिया गया होता तो इस सीरीज को देखने का कुछ और ही आनंद होता। आठ एपिसोड में काफी टर्न और ट्विस्ट आते हैं। फिलहाल यह रिव्यू सिर्फ दो एपिसोड पर आधारित है।