राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम एक ऐसी सरकारी संस्था है जिसका कार्य देश में अच्छे सिनेमा के निर्माण के साथ-साथ सिनेमा के व्यवसाय को व्यवस्थित करना है। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों से राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम के सहयोग से ऐसी फिल्में बन रही हैं, जो न तो दर्शकों की अपेक्षाओं पर खरी उतर रही हैं और, न ही उनके व्यवसाय में ही कुछ सुधार होता दिख रहा है। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम के सहयोग से जितनी भी फिल्में बनी हैं, उनकी कहानी का प्लॉट बहुत अच्छा होता है। लेकिन, जिस तरह से कहानी कागज पर लिखी होती है, उस तरह से रुपहले पर्दे पर नहीं उतर पाती है। ऐसा ही कुछ फिल्म 'चिड़ियाखाना' के साथ होता दिख रहा है।
फिल्म 'चिड़ियाघर' में लेखक-निर्देशक मनीष तिवारी ने एक ट्विस्ट लाने की कोशिश की। और, वह ट्विस्ट है कि सभी इंसान के अंदर एक जानवर होता है। अगर फुटबॉल मैच जीतना है तो हमारे अंदर जो जानवर है, उसे ताकत के रूप में इस्तेमाल किया जाए। इसी सोच के तहत किरदार जानवरों की शक्ल में दिखने दिखते हैं। मुंबई के टॉप फुटबॉल खिलाड़ियों से सरकारी स्कूल के जर्जर इमारत में पढ़ने वालो बच्चों का फुटबॉल मैच होता है। जाहिर सी बात है कि फिल्म है तो जीत सरकारी स्कूल में पढ़ने बच्चों की ही होनी है। लेकिन, फिल्म को परिणाम तक लाने में इसे कैसे ‘चक दे इंडिया’ बनाया जाए उसमें फिल्म के निर्देशक पूरी तरह फेल हो गए हैं।
फिल्म की कहानी फुटबॉल खेल को बढ़ावा देने के बारे में हैं, लेकिन फिल्म आगे बढ़ती है तो इसमें भू माफिया, गैर मुम्बईकर और बिहार का नक्सलवाद जैसा मुदा भी आ जाता है। सूरज की मां की नक्सलवादी की पत्नी की भूमिका में दिखाया गया है जिसकी मुठभेड़ में मृत्यु हो जाती है। वह अपने अतीत से बचने के लिए शहर दर शहर भटकते हुए मुंबई पहुंच जाती है। मुंबई पहुंचने के बाद उनका भाई ढूंढ लेता है। यहां से लगता है कि कहानी में एक नया ट्विस्ट आ सकता है लेकिन निर्देशक ने ये पूरा ट्रैक बस दो मिनट में निपटा दिया है और फिल्म 'चिड़ियाघर' बस चूं चूं का मुरब्बा बन कर रह जाती हैं।
फिल्म 'चिड़ियाघर' के निर्देशक मनीष तिवारी की पिछली फिल्म 'दिल दोस्ती इटसेट्रा' के निर्माता प्रकाश झा थे। फिल्म साल 2007 में रिलीज हुई और फ्लॉप करार दी गई। फिर 2013 में मनीष तिवारी ने प्रतीक बब्बर, अमायरा दस्तूर और रवि किशन को लेकर फिल्म 'इसक' बनाई। तब की दोस्ती निभाने के लिए अभिनेता रवि किशन भी फिल्म 'चिड़ियाघर' में हैं और बस एक दृश्य में अपना एहसान उतारकर गायब हो जाते हैं।