फिल्म ‘डेडपूल 2’ और ‘फास्ट एंड फ्यूरियस: हॉब्स एंड शॉ’ जैसी फिल्मों से अपना एक अलग दर्शक वर्ग भारत में भी तैयार कर चुके निर्देशक डेविड लीच बड़े परदे पर बेतुके, अटपटे और अपराध की छीछालेदर कर देने वाले एक्शन सीन्स की वजह से जाने जाते हैं। इस मायने में फिल्म ‘बुलेट ट्रेन’ उनके सिनेमा का एक नया प्रस्थान बिंदु बनने की कोशिश करती दिखती है। फिल्म ‘बुलेट ट्रेन’ कमजोर दिल वालों के लिए नहीं है। इसके किरदारों के हाथ खून से रंगे हुए हैं और दिल बेजान हैं। कहानी कहने को सिंपल सी है। अपने अतीत को भुलाकर शांत की तलाश में निकले एक भाड़े के हत्यारे को उसका काम देखने वाली नया नाम देती है, लेडीबग। लेडीबग का काम है टोक्यो से कोयटो जा रही ट्रेन में रखे एक ब्रीफकेस को चुराकर अगले स्टेशन पर उतर जाना। लेकिन, इस सिंपल सी दिखने वाले काम को लेडीबग भी समझ जाता है कि ये जरूरत से ज्यादा आसान है और ऐसा होता नहीं है।
कहानी के दूसरे सिरे पर पहुंचने पर पता चलता है कि इसी ट्रेन में और भी बहुत सारे कातिल जो मौजूद रहे हैं, उसकी वजह क्या है। सबकी अपनी अपनी राम कहानी है और सबके अपने अपने लाइफ गोल्स हैं। कहानी का सबसे कमजोर पेंच है स्कूल की बच्ची जैसी दिखती ‘प्रिंस’ जो एक मासूम बच्चे को छत से नीचे फेंक उसके पिता को इस ट्रेन पर इसलिए ले आई है कि वह इस ब्रीफकेस का ताला खोल सके। ब्रीफकेस में फिरौती की रकम है और जिस माफिया डॉन के बेटे को छुड़ाने के लिए ये फिरौती दी जानी थी, उसे लेकर दो और भाड़े के हत्यारे लेमन और टैन्जरीन मंजिल के लिए निकले हैं। ट्रेन धीरे धीरे खाली होती जाती है। और, ट्रेन के सहयात्री जैसे जैसे कम होते जाते हैं, कहानी का आधार भी वैसे वैसे छिछला होता जाता है।
निर्देशक डेविड लीच की फिल्में देखने वालों को पहले से पता होता है कि उनकी फिल्म में वह क्या देखने आए हैं। फिल्म ‘बुलेट ट्रेन’ एक आम मनोरंजक हॉलीवुड फिल्म नहीं है। ये पीएस 4 पर खेले जाने वाले किसी ऐसे वीडियो गेम की तरह है जिसमें खिलाड़ी उंगलियों के इशारे पर सिर काटता चलता है। परदे पर खून दिखता है लेकिन देखने वाले के मन में न तो किसी तरह के भाव आते हैं और न ही किसी तरह का कोई एहसास ही जागता है। यहां खेल के मुख्य खिलाड़ी ब्रैड पिट हैं। वह सुलझे हुए अभिनेता रहे हैं। फिल्में भी कायदे की ही चुनते रहे हैं। यहां भी डेविड ने उनके किरदार को साफ सुथरा बनाए रखते हुए उनके आसपास की कारगुजारियों का दलदल ऐसा रचा है कि इसके छींटें भी जब लेडीबग पर पड़ते हैं तो दर्शकों को लगे कि दाग अच्छे हैं।
लेकिन फिल्म ‘बुलेट ट्रेन’ दर्शकों को साथ लेकर चलने वाली फिल्म नहीं है। इसीलिए नामचीन किरदारों के परदे पर आने पर उनका पोस्टर भी साथ में चला आता है। ‘किल बिल’ सीरीज जैसी दिखती फिल्म ‘बुलेट ट्रेन’ में ट्रेन से जुड़ा एहसास बस इतना है कि ये ट्रेन किसी भी स्टेशन पर एक मिनट से ज्यादा नहीं रुकती है और प्लेटफार्म के 60 सेकेंड वाले कुछ दृश्यों के अलावा इसकी कहानी ट्रेन में ही अटकी रहती है। ट्रेन भी ऐसी है कि कहानी के तय किरदारों के अलावा कोई मुसाफिर इसका हिस्सा नहीं बनता। सिवाय एक मौके पर जब लेमन और लेडीबग लड़ते हैं और एक बुजुर्ग महिला उन्हें शांत रहने को कहती है।
निर्देशक डेविड लीच ने ये फिल्म इसके लीड कलाकार ब्रैड पिट के साथ मिलकर ही सोची है। ज्यादातर कलाकारों के चयन में भी ब्रैड पिट की सलाह शामिल रही है। ऐसे में फिल्म का पूरा ठीकरा इन दोनों पर ही फूटना है। कलाकारी में आगे रहे ब्रैड पिट का अदाकारी में तकरीबन सारे दूसरे कलाकारों ने एक सा साथ दिया है। सब धान यहां बाईस पसेरी हैं। अपने अपने किरदार में मगन। कहानी से अलग अलग समय पर निकले कल्लों की तरह जिनका समग्र योगदान फिल्म को संपूर्ण पहचान दिलाने में क्या रहा, फिल्म देखकर सिनेमा हॉल से निकलने के बाद सोचना पड़ता है।