70 के दशक में महिला सशक्तीकरण की ये एक ऐसी कहानी है जो बड़े परदे पर भी रिलीज होती तो शर्तिया सुपरहिट होती। फिल्म की जान है बिदिता बाग का रेशमा पठान के किरदार में बदल जाना। बिदिता के कमाल के अभिनय के चलते फिल्म देखते समय आपका कलेजा कई बार मुंह को आएगा।
बिदिता के इस किरदार में कमाल का ग्राफ है। वह अपने पिता से पिटती है पर मार खाती रहती है। गली का शोहदा उसे गाली देता है तो वह अकेले आधा दर्जन गुंडों को धो डालती है। साथ काम करने वाला कंधे को हाथ लगाता है तो वह झटककर आगे चल देती है। सुपरस्टार उसे दबोचने की कोशिश करता है तो वह पलटकर करारा जवाब देती है। तबस्सुम के मशहूर टीवी कार्यक्रम फूल खिले हैं गुलशन गुलशन वाला इंटरव्यू कमाल का क्लाइमेक्स है फिल्म का।
फिल्म में चंदन सान्याल ने भी कमाल का अभिनय किया है। रेशमा के गुरुजी बने चंदन ने ही फिल्म को कहीं थकने नहीं दिया है। रास्ते में कलाबाजियां करती लड़की का हुनर पहचानने वाला सीन हो या फिर अस्पताल में पड़ी रेशमा को फिर से शोले का तांगा वाला सीन करने के लिए सेट पर लाने से पहले परेशान होने वाला सीन। चंदन ने अपना हुनर इस किरदार पर चस्पा कर दिया है। फिल्म के संवाद दमदार हैं। ये कभी रुलाते हैं तो कभी आपका कलेजा मुंह को ले आते हैं।
और, ये सब कुछ कायदे से जमा है तो इसके लिए सबसे ज्यादा तारीफ की हकदार हैं श्रावणी देवधर जिन्होंने इस कहानी पर फिल्म बनाने का सोचा और फिल्म के निर्देशक आदित्य सरपोतदार। फैजल अख्तर की स्क्रिप्ट बहुत चुस्त और रफ्तार वाली है। बाकी कैमरा, एडिटिंग, कॉस्ट्यूम, मेकअप और बैकग्राउंड म्यूजिक सब सीधे आपको सत्तर के दशक में पहुंचा देते हैं। नेटफ्लिक्स की रोमा अगर ऑस्कर जीतकर ला सकती है तो जी5 की शोले गर्ल को कम से कम राष्ट्रीय पुरस्कार लाना तो बनता है।