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Bharat Bhhagya Viddhaata Review: कंगना ने संभाला मोर्चा, लेकिन क्या कहानी पूरा असर छोड़ पाती है? पढ़िए रिव्यू

सार

Bharat Bhhagya Viddhaata Movie Review: कंगना रनौत की फिल्म 'भारत भाग्य विधाता' आखिर सिनेमाघरों में सज गई है। कैसी है फिल्म? पढ़िए रिव्यू
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भारत भाग्य विधाता रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
भारत भाग्य विधाता
कलाकार
कंगना रनौत , गिरिजा ओक , स्मिता तांबे , आशा शेलार , प्रिया अर्जुन बेर्डे , जाहिद खान और सुहिता थट्टे
लेखक
मनोज तापड़िया
निर्देशक
मनोज तापड़िया
निर्माता
कंगना रनौत, शैलेश आर. सिंह, धवल गडा, बबीता अशीवाल, आदि शर्मा
रिलीज:
12 जून 2026
रेटिंग
3/5

विस्तार
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26 नवंबर 2008 की वह रात भारत शायद कभी नहीं भूल पाएगा। मुंबई पर हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। आतंकियों ने एक साथ शहर के कई हिस्सों को निशाना बनाया था। इनमें ताज महल पैलेस होटल, ओबेरॉय-ट्राइडेंट होटल, सीएसटी रेलवे स्टेशन, लियोपोल्ड कैफे, नरीमन हाउस और कामा अस्पताल जैसी जगहें शामिल थीं।

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भारत भाग्य विधाता रिव्यू - फोटो : सोशल मीडिया
इस घटना पर पहले भी कई फिल्में और डॉक्यूमेंट्री बन चुकी हैं। लेकिन ज्यादातर कहानियां पुलिस, सिक्योरिटी फोर्स या आतंकियों के खिलाफ चले ऑपरेशन के इर्द-गिर्द ही घूमती रही हैं। ‘भारत भाग्य विधाता’ यहां थोड़ा अलग रास्ता चुनती है। यह फिल्म उन नर्सों और अस्पताल कर्मचारियों की कहानी दिखाती है...जिन्होंने उस रात अपनी जान की चिंता किए बिना मरीजों की सुरक्षा को सबसे ऊपर रखा। फिल्म का यही पहलू शुरुआत से दिलचस्प लगता है। हालांकि विषय मजबूत होने के बावजूद फिल्म हर जगह वैसा असर नहीं छोड़ पाती, जैसा इससे उम्मीद की जाती है। पढ़िए पूरा रिव्यू.

भारत भाग्य विधाता रिव्यू - फोटो : सोशल मीडिया
कहानी
फिल्म की कहानी कामा अस्पताल की कुछ नर्सों और कर्मचारियों के इर्द-गिर्द घूमती है। इसके केंद्र में गीता माधव (कंगना रनौत) का किरदार है। गीता और उसकी टीम सिर्फ साथ काम करने वाले लोग नहीं हैं। उनके बीच एक अपनापन और दोस्ती भी साफ नजर आती है। अस्पताल में काम का दबाव है, लेकिन बीच-बीच में मजाक, छोटी-छोटी बातें और उनका आपसी रिश्ता माहौल को हल्का बनाए रखता है।

फिल्म की शुरुआत अस्पताल के एक बिल्कुल सामान्य दिन से होती है। मरीज आ रहे हैं और काम लगातार चल रहा है। इसी बीच ऑडियंस को इन किरदारों की निजी जिंदगी की छोटी-छोटी झलक भी देखने को मिलती है। कोई परिवार की जिम्मेदारियों में उलझा है, तो कोई अपनी निजी परेशानियों से जूझ रहा है। अस्पताल की नौकरी सबके लिए सिर्फ काम नहीं, जिम्मेदारी भी है।

धीरे-धीरे कहानी उस रात तक पहुंचती है जिसने मुंबई की तस्वीर बदल दी। शहर में गोलियां चल रही हैं। हर तरफ डर का माहौल है और अस्पताल के भीतर मौजूद लोगों को समझ नहीं आ रहा कि आखिर बाहर क्या हो रहा है। लेकिन इतना साफ है कि खतरा अब उनके बेहद करीब पहुंच चुका है।

इसके बाद फिल्म अस्पताल में मौजूद मरीजों, गर्भवती महिलाओं और स्टाफ के संघर्ष को दिखाती है। सबके सामने एक ही सवाल है -  खुद को बचाया जाए या उन लोगों को, जिनकी जिम्मेदारी उनके कंधों पर है। फिल्म यही बताने की कोशिश करती है कि बहादुरी सिर्फ हथियार उठाने वालों की नहीं होती। कई बार मुश्किल हालात में भी अपने काम पर डटे रहना ही असली हिम्मत होती है।

भारत भाग्य विधाता रिव्यू - फोटो : यूट्यूब ग्रैब
अभिनय
कंगना रनौत फिल्म की सबसे बड़ी ताकतों में से एक हैं। पिछले कुछ वर्षों में उनकी फिल्मों में कई बार उनका स्टारडम किरदार पर भारी पड़ा ..लेकिन यहां वह काफी कंट्रोल में नजर आती हैं। एक नर्स के किरदार में उन्होंने जरूरत से ज्यादा ड्रामा करने से बचने की कोशिश की है। यही चीज उनके अभिनय को बेहतर बनाती है।

फिल्म के कुछ हल्के-फुल्के सीन्स में कंगना के अभिनय में कहीं-कहीं ‘क्वीन’ वाली वही पुरानी सहजता भी नजर आती है, जिसे ऑडियंस ने काफी पसंद किया था। कई सीन्स में उनके चेहरे के भाव काफी असर छोड़ते हैं। डर, जिम्मेदारी और उस वक्त की घबराहट को उन्होंने अच्छी तरह पकड़ा है। सपोर्टिंग कास्ट की बात करें तो गिरिजा ओक, स्मिता तांबे, आशा शेलार और प्रिया अर्जुन बेर्डे भी फिल्म में अच्छा काम करते हैं। अच्छी बात यह है कि ज्यादातर कलाकार मराठी सिनेमा से लिए गए हैं। मुंबई की कहानी को देखते हुए यह फैसला बिल्कुल सही लगता है।
इससे फिल्म कई जगह और ज्यादा असली लगती है। अच्छी बात यह है कि फिल्म सिर्फ कंगना के भरोसे नहीं चलती। पूरी टीम मिलकर कहानी को आगे बढ़ाती है।

भारत भाग्य विधाता - फोटो : यूट्यूब ग्रैब
निर्देशन
मनोज तापड़िया लंबे समय से फिल्म इंडस्ट्री में लेखक और क्रिएटिव प्रोफेशनल के तौर पर काम करते रहे हैं। ‘चीनी कम’, ‘मद्रास कैफे’, ‘साला खड़ूस’ और ‘एनएच10’ जैसी फिल्मों से उनका नाम जुड़ा रहा है। यही वजह है कि कहानी कहने का उनका नजरिया यहां भी अलग दिखाई देता है।

‘भारत भाग्य विधाता’ में वह 26/11 को उसी पुराने ढर्रे पर नहीं दिखाते, जहां फोकस सिर्फ आतंकियों, पुलिस या ऑपरेशन पर हो। वह इस बार उन लोगों की कहानी सामने लाते हैं, जिनका जिक्र अक्सर ऐसी घटनाओं में पीछे छूट जाता है।

फिल्म का बड़ा हिस्सा अस्पताल के भीतर ही गुजरता है। इसलिए यहां गोलियों और धमाकों से ज्यादा डर, बेचैनी और हालात से जूझते लोगों का तनाव देखने को मिलता है। कई जगह वह इस माहौल को पर्दे पर असरदार तरीके से उतारने में सफल रहते हैं।

हालांकि फिल्म को पूरी तरह अस्पताल तक सीमित रखने का फैसला थोड़ा कमजोर भी पड़ता है। यही फैसला फिल्म को अलग पहचान तो देता है, लेकिन कई जगह कहानी का असर उतना बड़ा नहीं बन पाता, जितना 26/11 जैसे विषय से उम्मीद की जाती है।

भारत भाग्य विधाता - फोटो : Instagram @Kangana Ranaut
फिल्म कहां कमजोर पड़ती है?
फिल्म की सबसे बड़ी कमी यह है कि यह 26/11 जैसे बड़े हमले का पूरा माहौल उतना नहीं बना पाती। आज की नई पीढ़ी ने 26/11 को करीब से नहीं देखा। उनके लिए यह सिर्फ किताबों या खबरों में पढ़ी गई एक घटना है। ऐसे में अगर फिल्म उस रात मुंबई के अलग-अलग हिस्सों में क्या हो रहा था और पूरा शहर किस डर से गुजर रहा था, यह थोड़ा और विस्तार से दिखाती, तो कहानी का असर ज्यादा होता।

शुरुआत में फिल्म किरदारों को स्थापित करने में थोड़ा ज्यादा वक्त लेती है। इसकी वजह से कहानी अपनी असली दिशा में आने में देर करती है और कुछ जगह रफ्तार धीमी लगती है। फिल्म में कई इमोशनल सीन्स हैं... लेकिन कुछ जगह ऐसा महसूस होता है कि ऑडियंस को जबरदस्ती भावुक करने की कोशिश की गई है। अगर इन सीन्स को थोड़ा और सहज रखा जाता, तो असर ज्यादा पड़ सकता था। 
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भारत भाग्य विधाता - फोटो : Instagram @Kangana Ranaut
देखें या नहीं?
‘भारत भाग्य विधाता’ उन लोगों की कहानी सामने लाती है, जिनका नाम अक्सर इतिहास की बड़ी चर्चाओं में पीछे रह जाता है। यही बात फिल्म को बाकी 26/11 पर बनी फिल्मों से अलग बनाती है।
कंगना रनौत और बाकी कलाकार अच्छा काम करते हैं। निर्देशक की सोच भी साफ नजर आती है। हालांकि मजबूत विषय होने के बावजूद फिल्म कुछ कमियों की वजह से वैसा असर नहीं छोड़ पाती, जिसकी उम्मीद बनती है। फिर भी फिल्म देखने लायक है, क्योंकि यह उन लोगों की बहादुरी को सामने लाती है, जिनका जिक्र अक्सर सुर्खियों में नहीं होता।
फिल्म का विषय मजबूत है और कहानी भी अलग है। लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले और कुछ अनावश्यक नाटकीय सीन्स की वजह से यह एक बेहतरीन फिल्म बनने से थोड़ा पीछे रह जाती है।
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